Uttarakhand : रावत मामले में एक तरफा आदेश सुनाने पर HC को SC का जमकर फटकार, 4 हफ्ते बाद होगी सुनवाई

 

नई दिल्ली : उत्तराखंड सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ हाईकोर्ट द्वारा CBI जांच का आदेश देने के बाद पूरे राज्य में विपक्षी पार्टियां त्रिवेंद्र सिंह रावत के इस्तीफे की मांग करने लगे। इसे लेकर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की ओर रूख किया, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर हाईकोर्ट को जमकर फटकारा। इसके साथ ही उसके आदेश को भी खारिज कर दिया। आपको बता दें कि SC ने इस मामले में सभी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है और 4 हफ्ते बाद सुनवाई की बात कही है।

दरअसल एक न्यूज़ चैनल के सीईओ उमेश कुमार ने फेसबुक पर एक वीडियो अपलोड कर यह आरोप लगाया था कि 2016 में झारखंड में बीजेपी के प्रभारी रहते हुए त्रिवेंद्र सिंह रावत ने रांची के एक व्यक्ति से 25 लाख रुपए की रिश्वत ली थी। झारखंड गौ सेवा आयोग का चेयरमैन बनने के लिए उस व्यक्ति ने जो रिश्वत दी थी, उसे सीएम के दो रिश्तेदारों के खाते में ट्रांसफर करवाया गया था। पत्रकार ने जिन 2 लोगों को सीएम का रिश्तेदार बताया था, उन्होंने देहरादून के नेहरू नगर थाने में एफआईआर दर्ज करवाई।

उन्होंने बताया कि वह सीएम के रिश्तेदार नहीं हैं। वीडियो में फर्जी कागजात दिखाकर उन्हें बदनाम किया गया है। इस मामले में पुलिस ने उमेश कुमार और उनके साथी पत्रकार शिव प्रसाद सेमवाल के खिलाफ धोखाधड़ी, फर्जीवाड़ा जैसे आरोपों में एफआईआर दर्ज की। साथ ही सरकार को अस्थिर करने की साजिश रचने के लिए राजद्रोह की धारा भी एफआईआर में जोड़ी गई।

आपको बता दें कि इस मामले में दोनों पत्रकारों ने एफआईआर को निरस्त करने के लिए उत्तराखंड हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की। हाई कोर्ट के जस्टिस रविंद्र मैथानी की सिंगल जज बेंच ने न सिर्फ एफआईआर निरस्त करने का आदेश दिया, बल्कि मुख्यमंत्री के ऊपर लगे आरोपों की सीबीआई जांच का भी आदेश दे दिया। जज ने कहा कि लोगों के सामने आरोपों की सच्चाई सामने आनी ज़रूरी है।

आपको बता दें कि इस फैसले के खिलाफ उत्तराखंड सरकार और सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसकी सुनवाई जस्टिस अशोक भूषण, एम आर शाह और आर सुभाष रेड्डी की बेंच ने की। उत्तराखंड सरकार की तरफ से पैरवी करते हुए एटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल पत्रकारों के खिलाफ हाई कोर्ट के आदेश को गलत बताया।

वहीं SC ने पूरे मामलों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट के फैसले पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि, “इस तरह का आदेश कैसे दिया जा सकता है? मामले में न तो सीएम के खिलाफ जांच की कोई मांग की गई थी, न ही सीएम को नोटिस जारी कर कोर्ट ने उनकी बात सुनी। अचानक सबको हैरान करते हुए ऐसा आदेश दे दिया गया, जिस पर सुनवाई के दौरान कोई चर्चा भी नहीं हुई थी।“

जजों ने कहा कि, “इस मामले में अभी इससे ज्यादा दलीलों की जरूरत नहीं है। आदेश पहली नजर में गलत नजर आता है। इस पर रोक लगाए जाने की जरूरत है। हम आदेश पर रोक लगाते हुए सभी पक्षों को नोटिस जारी कर रहे हैं। 4 हफ्ते बाद इस पर आगे सुनवाई होगी।“

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