किसान बिल पर किसानों या केंद्र सरकार के साथ शिवसेना?

 

नई दिल्ली : महाराष्ट्र सरकार की सत्ता की कमान संभाले बैठे उद्धव ठाकरे  इन दिनों काफी असमंजस में दिखाई दे रहे हैं। आपको बतादें कि राज्य में शिवसेना ने राकपा(NCP) और कांग्रेस के साथ मिलकर कमान संभाली थी। वहीं अब गत 3 दिन से शिवसेना और भाजपा के साथ हुई मुलाकातों से एक बार फिर महाराष्ट्र में कमल खिलने के आसार है और अघाड़ी दलों के सपनों पर पानी फिर सकता है।

गौरतलब है कि देश में कृषी विधेयक बिल पर राष्ट्रपति की मुहर लग चुकी है। लेकिन देश के कई हिस्सों में  कृषि बिल के खिलाफ विपक्ष द्वारा लगातार विरोध प्रदर्शन जारी है। जिसे देखते हुए महाराष्ट्र की गठबंधन वाली सरकार में कांग्रेस और राकपा ने बिलों को राज्य में लागू करने पर विरोध जताया है। वहीं इस पर शिवसेना के तेवर थोड़े मद्धम नज़र आ रहे हैं। बता दें कि राज्य में तो सरकार ने अगस्त में एक परिपत्र जारी किया था, जिसमें सभी स्थानीय अधिकारियों को बिलों के लिए जारी अध्यादेश को लागू करने का निर्देश दिया गया था।

दरअसल, कृषी विधेयक को लेकर NCP और कांग्रेस का रुख शुरु से ही साफ है। ऐसा इसलिए क्योंकि उपमुख्यमंत्री अजीत पवार ने पिछले हफ्ते ही साफ कर दिया था कि राज्य की सरकार इस बिल को महाराष्ट्र में लागू नहीं होने देगी। इसके साथ ही राज्य कांग्रेस के प्रमुख बालासाहेब थोरात का कहना है कि राज्य में सत्ता संभाल रहीं तीनों पार्टी इस बिल को राज्य के अन्दर दाखिल ही नहीं होने देगी।

आपको बता दें कि शिवसेना ने इस बिल पर अभी कोई शिरकत नहीं की है। CM उद्धव ने केन्द्र की इस पहल पर कुछ सप्ताह पहले केंद्रीय कृषि मंत्रालय की समीक्षा बैठक के दौरान भी केंद्र को बधाई दी थी। वहीं दूसरी ओर पार्टी  कृषी बिल का राज्यसभा से बिल पर वोटिंग के दौरान बाहर जाकर समर्थन भी कर चुकी है। इसके साथ ही शिवसेना के पदाधिकारी का कहना है कि , “तीनों सत्तारूढ़ दलों की समन्वय बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा की जाएगी।  बिलों के बारे में हमारा रुख जल्द ही साफ हो जाएगा।'

असल में देश के कई हिस्सों में कई अन्य विपक्षी दल अपना रुख  इस बिल पर बिल्कुल साफ कर चुके हैं। वहीं कांग्रस का कहना है कि जिन राज्यों में कांग्रस की सरकार है उन राज्यों में इस बिल का कोई वैकल्पिक रास्ता ढूढ़ेगी और कहीं भी इस को लागू नहीं होने देगी। वहीं पंजाब में भी इस बिल के विरोध में कैप्टन अमरिंदर सरकार सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने का अपना निर्णय ले चुकी है।

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