धाधंली का आलम ऐसा कि सीमेंट और जूते की दुकान में मिल रहे हैं स्कूल के कपड़े, अब हो रही है जांच

 

रिपोर्ट : स्वाती सिंह

नई दिल्ली : वैसे भारत में भ्रष्टाचार आम बात हो गई है। बड़े लेवल से लेकर छोटे लेवल तक लोग अपने स्वार्थ के लिए आम जनता को बेवकूफ बना रहे हैं। हर आदमी किसी न किसी तरह कमीशनखोरी का जुगाड़ कर रहा है और लोगों की मजबूरी का पूरा फायदा उठा रहा है। अब एक ऐसी ही घटना झारखंड से सामने आई है। जहां एक ऐसे ही कमीशन खोरी और धांधली का शिकार स्कूली बच्चे और उनके माता पिता हो रहे थे। स्कूलों में हो रही ऐसी धांधली को रोकने के लिए कई संगठन बनाए गए हैं लेकिन अब तो ये ही सवालों के घेरे में है। स्कूल प्रबंधन समिति पर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं।

दरअसल स्कूल की तरफ से स्कूल ड्रेस के लिए एक स्पेशल बायर की ही जानकारी दी गई और बच्चों को वहीं से स्कूल ड्रेस खरीदने के लिए कहा गया। जब माता पिता बताई जगह पर पहुंचे तो पता चला कि ये दुकानें सीमेंट बेचने और जूता बेचने वाली है लेकिन यहां पर बताई गई स्कूल ड्रेस भी मिल रही है। वित्तीय वर्ष 19-20 के मामले में ये गड़बड़ी सामने आई है। वैसे ये कोई नई बात नहीं है। हर जगह यहीं होता है दिल्ली से लेकर दौलताबाद सबकी कहानी यही है। स्कूल अपनी कमीशनखोरी के चलते अपने जुगाड़ी दुकानों और लोगों को स्कूली पोशाक बेचने की जिम्मेदारी दे देते हैं। उसके बाद बच्चों को वहीं से स्कूल ड्रेस लेना कम्पलसरी कर देते है। इसका कारण यही है कि ये मिली भगत वाला दुकानदार को ऊंचे दाम में बेचता है और प्रॉफिट का पैसा आराम से स्कूल और खुद में रखता है। अब इस तरह से स्कूली बच्चों और उनके अभिभावकों को चूना स्कूल और दुकानदार दोनों मिल कर लगा रहे हैं। खैर इसी बीच झारखंड में चल रहे गोरखधंधे का पता चल गया और अब इसके खिलफ जांच की जा रही है।

झारखंड के केस की बात करें तो वित्तीय वर्ष 19-20 के लिए जिले में वर्ग एक एवं दो के बच्चों को स्कूल प्रबंधन समिति द्वारा क्रय कर दी जाने वाली पोशाक में कई गड़बड़ी सामने आ रही है। विभाग को शिकायत मिली थी कि एसएमसी द्वारा पोशाक क्रय में नियम एवं निर्देशों की अवहेलना की गई है। आपको बता दें कि कमीशनखोरी को लेकर सीमेंट व जूता दुकानों से भी पोशाक क्रय किया गया है। कई दुकानों का पता तक सही नहीं है। कई सप्लायरों ने फर्जी जीएसटी बिल देकर पोशाक की आपूर्ति की है। लोगों की शिकायतों पर गंभीरता से जांच शुरू कर दी गई है। अब दो दो दर्जन से भी ज्यादा स्कूल इस जांच के घेरे में है। वैसे आपको बता दें कि स्कूलों का मनमाना राज अभिभावकों के लिए मुसीबत बन गया है। स्कूल से किताबे लेने का खर्चा ही हजारों में फिर उसके बाद स्कूल के बेतुका नियम जिसमें हर साल ड्रेस कोड के चेंज होने से अभिभावकों की अच्छी चपत लगती है। इसलिए तो बड़े-बड़े शहरो में अपने बच्चों को पढ़ा पाना भी एक टास्क हैं।

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