आतंकी पिता का बेटा बना अफसर, मां के दृढ़ निश्चय ने कर दिया सपना सच

 

रिपोर्ट : स्वाती सिंह

नई दिल्ली : कहते हैं इंसान अपनी किस्मत खुद लिखता है। अगर वो चाहे तो कोयले से हीरा निकाल सकता है ठीक उसी तरह एक मां खुद पर लगा आतंकी की पत्नी धब्बा तो न धो पाई लेकिन उसने अपने बेटे के नाम पर से एक आंतकी के बेटे का धब्बा धो दिया है। दरअसल जम्मू-कश्मीर में पनप रहे आतंकियों और आतंकी संगठनों के सारे से एक मां ने अपने बेटे को इतना दूर कर दिया की अब वो इन्हीं आतंकियों का खात्मा करने के लिए सरकार में अधिकारी हो गया है। एक तरफ आतंकवाद का साया तो दूसरी ओर हालात की मार लेकिन इस मां ने घुटने नहीं टेके। पति तो आतंकी था लेकिन इस मां ने हालात से हार न मानकर बेटे को खुद से अलग कर दिया और अपने त्याग से आज उनका बेटा अधिकारी है। एक आतंकी की पत्नी का धब्बा लिए एक मां ने अपने लाडले की जिंदगी संवारने के लिए उसे बाल आश्रम भेज दिया। बाल आश्रम में इस बेटे ने अपनी जिंदगी को संवारा और मां के सपनों को पूरा किया।

आपको बता दें कि जज्बे और कड़ी मेहनत के बल पर आज मां का वही लाडला गाजी अब्दुल्ला सरकारी अधिकारी बन गया है। उसका कश्मीर प्रशासनिक सेवा परीक्षा में चयन हुआ है और अब वो अपनी मां के सार सिर ऊंचा करके जम्मू-कश्मीर का भविष्य सुधारने में सरकार की सहायता करेगा। एक आंतकी के बेटे से एक सरकारी अधिकारी होने तक का सफर गाजी अब्दुला के लिए आसान नहीं था लेकिन मां के दृढ़ निश्चय के आगे उसे वो सभी समस्याएं इतनी छोटी लगी की आज वो उसी मां का हाथ पकड़ कर इस नए बदलाव के लिए हाजिर है।

बता दें कि जम्मू संभाग के डोडा के पिछड़े गांव गुंदना के गाजी को अफसर बनते देख मां की खुशी का ठिकाना नहीं है। जम्मू कश्मीर और लद्दाख के 70 उम्मीदवार इस बार केएएस (कश्मीर प्रशासनिक सेवा) के लिए चुने गए हैं। गाजी भी इन्हीं मे से एक है लेकिन उसका परिश्रम इन सभी में सबसे अलग हैं। गाजी का बचपन बाल आश्रम में बीता है। जब वह दो साल के थे तो निजी स्कूल में शिक्षक पिता मोहम्मद अब्दुल्ला बट वर्ष 1998 में आतंकवादी वारदातों में संलिप्त होने पर मुठभेड़ में मारे गए। इसके बाद से ही उसकी जिंददगी बदल गई। आतंकी का बेटा होने का धब्बा वो तब से लेकर घूम रहा था। समाज के तानों से मां ने आखिरी में निश्चय किया वो अपने बेटे के माथे से ये धब्बा हटा कर रहेंगी चाहे इसके लिए उन्हें उससे अलग ही क्यों न होना पड़े।

आलम ये था कि घर में चूल्हा तक नहीं जल पाता था लेकिन मां ने अपने बच्चे को आंतक के साये से दूर रखा।  बच्चे की लगन देखकर आंगनबाड़ी में मददगार मां नगीना बेगम ने आतंकवाद के साए से दूर रखकर गाजी को श्रीनगर के बेमिना में स्थित बाल आश्रम में भेज दिया। गाजी ने 12वीं तक पढ़ाई श्रीनगर के बाल आश्रम में रहकर पूरी की। श्रीनगर में रह कॉलेज में पढ़ना उसके बस में नहीं था। 18 साल के बाद आश्रम में रहने की इजाजत नहीं थी। काम धंधा भी कोई नहीं था। गाजी ने डोडा लौटने का फैसला किया और डोडा स्थित सरकारी कॉलेज में दाखिला ले लिया। इसके बाद ही सरकारी अधिकारी बनने का जूनून चढ़ा और आखिरी में गाजी ने अपना और अपनी मां का सपना पूरा किया। हाथ में आतंकी बंदूक  थामने की बजाए उसने कलम का ताकत को पहचाना और अब वह जम्मू-कश्मीर को बेहतर बनाने के लिए सरकार का सहयोग करेगा।

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