बिहार में थर्ड फ्रंड बनने के दिख रहे आसार, जनता हो रही कंफ्यूज

 

पटनालोकतंत्र का सबसे बड़ा महापर्व चुनाव होता है। और ये चुनाव अगर बिहार में हो तो यहां कई तरह के समीकरण देखने को मिलते है। इस बार बिहार में तीन चरण में चुनाव कराने की घोषणा चुनाव आयोग ने कर दी है। लेकिन कुछ राजनीतिज्ञों का मानना है की बिहार में जब भी चुनाव होता है वही जाति का समीकरण हमेशा से बनता आया है। लेकिन आप के इस इस गलतफहमी को खत्म करना जरूरी है कि बिहार एक जातिवादी राज्य है। यह वैसा ही एक राज्य है जैसे कि अन्य राज्य हैं। बिहार के  बारे में एक सच है यह जरूर है कि पिछड़ी जातियां भी यहां उतनी ही आक्रामक हैं जितनी बिहार की सवर्ण जातियां। इस आक्रामकता की जड़ में है खेती और चुनाव में उम्मीदवार बनाना। लेकिन देश में कोरोनाकाल में बिहार में हो रहे चुनाव कई वजहों से अलग है। कोरोना काल के बीच देश का यह पहला बड़ा चुनाव होने जा रहा है। इस चुनाव में हजारों-लाखों लोगों के बीच नेताओं की जनसभा या रैली नहीं बल्कि वर्चुअल रैली पर अधिक फोकस होगा। ऐसे में मतदाताओं की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है।

लेकिन, सबसे अहम बात ये है कि पहले चरण के नामांकन में महज एक दिन बच गया है लेकिन अब तक किसी भी गठबंधन में सीट शेयरिंग की स्थिति स्पष्ट नहीं हुई है। लोगों को ये तक नहीं पता है कि कौन सा दल किस गठबंधन में है।

सीट शेयरिंग को लेकर महागठबंधन के दो बड़े घटक कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल में तल्खी बढ़ती जा रही है। आरजेडी ने कांग्रेस को 58 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऑफर दिया है। लेकिन, कांग्रेस के अनुसार ये सम्मानजनक नहीं है। कांग्रेस का कहना है कि वो 73 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है। लेकिन गठबंधन धर्म के तहत एक-दो सीटें कम करने को तैयार है। दूसरी ओर एनडीए में एलजेपी बनी रहेगी या नहीं ये भी बड़ा सवाल है। क्योंकि, एलजेपी ने बीजेपी के 27 सीटों के ऑफर को सीधे तौर पर ठुकरा दिया है।

70 सीटों से कम पर कांग्रेस किसी भी सूरत में गठबंधन के लिए राजी नहीं है। इस सियासी उठापटक के बीच आरजेडी ने 58 से एक भी सीट ज्यादा देने से इंकार करते हुए कांग्रेस को 24 घंटे का अल्टीमेटम दे दिया है। अल्टीमेटम देते हुए ये स्पष्ट करने को कहा है कि कांग्रेस गठबंधन में रहेगी या नहीं ?

दूसरी तरफ महागठबंधन से अलग हुई उपेन्द्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के लिए सियासी जमीन बचाए रखने की चुनौती सामने आ गई है। एनडीए से भाव न मिलने के कारण उपेन्द्र कुशवाहा के लिए आगे कुंआ, पीछे खाई वाली कहावत हो गई। ऐसे में उन्होंने बीच का रास्ता निकालते हुए बहुजन समाज पार्टी और जनवादी सोशलिस्ट पार्टी के साथ बिहार में एक नया गठबंधन बना लिया है। बिहार के वर्तमान सियासी परिदृश्य में इस गठबंधन का क्या भविष्य होगा, ये उपेन्द्र कुशवाहा को भी बखूबी पता होगा।

हालांकि, अब इस बीच सबसे दिलचस्प बात ये है कि बिहार में थर्ड फ्रंड बनने के आसार भी नजर आ रहे हैं। दरअसल, कांग्रेस ने बुधवार को 3 बजे एक अहम बैठक बुलाई है जिसमें थर्ड फ्रंड के बनाने पर भी विचार किया जा सकता है। कयास लगाए जा रहे हैं कि कांग्रेस, चिराग पासवान और पप्पू यादव से भी बात कर सकती है। कांग्रेस के लीडरशीप में थर्ड फ्रंट बन सकता है जिसमें लेफ्ट के साथ-साथ आरएलएसपी, बीएसपी भी शामिल हो सकती है। अगर ऐसा होता है तो बिहार की सियासत में एक और बड़ा उलटफेर जल्द ही लोगों को देखने को मिल सकता है।

इन सारी सियासी खींचतान के बीच असल चुनौती बिहार की जनता के सामने है। क्योंकि जनता अपने नेता, उसकी पार्टी या गठबंधन की स्थिति देखकर ही वोट देने का मूड बनाती है। लेकिन इस बार के चुनाव में जनता के लिए भी कन्फ्यूजन वाले हालात नजर आ रहे हैं।

From around the web