किसानों आंदोलन से सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन होगा !

 

नई दिल्ली: केंद्र सरकार द्वारा नए कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे किसानों के आंदोलन का आज 45वां दिन है। आज भी किसान दिल्ली की सीमाओं पर प्रदर्शन कर रहे हैं। उनके और केंद्र सरकार के बीच बातचीत का नौवां दौर भी बेनतीजा रहा। अब किसानों और सरकार के बीच 15 जनवरी को आगामी बैठक होगी, लेकिन उससे पहले किसान आंदोलन को लेकर बड़ा उलटफेर हो सकता है। किसान नेताओं को भी यह अंदेशा है कि सरकार इस आंदोलन को तोड़ने के लिए कुछ बड़ा कर सकती है। केंद्र सरकार के प्रतिनिधि और चुनिंदा भाजपा नेता, उन राज्यों के किसान संगठनों को अपने पक्ष में खड़ा कर रहे हैं, जहां आंदोलन का असर नहीं है। अगर ऐसा हुआ तो किसान आंदोलन कमजोर पड़ सकता है। वहीं सुप्रीम कोर्ट में एक दायर याचिका भी किसान आंदोलन को कमजोर कर सकती है। 

बता दें की सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित किसान विरोध मामले में दायर एक याचिका में प्राथमिक याचिकाकर्ता ने अब एक हलफनामा दायर कर सड़क अवरुद्ध होने से आम जनता को होने वाली असुविधा और कठिनाई को उजागर किया है। याचिका में दिल्ली की विभिन्न सीमाओं पर विरोध प्रदर्शन कर रहे किसानों को हटाने की मांग की गई है। 11 जनवरी को निर्धारित याचिका पर सुनवाई से पहले यह हलफनामा दायर किया गया है और दलील दी गई है कि सड़कों की नाकाबंदी की वजह से आम जनता को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।


दिल्ली निवासी याचिकाकर्ता ऋषभ शर्मा द्वारा दायर हलफनामे में कहा गया है कि विभिन्न स्थानों पर किसानों द्वारा सड़कों की निरंतर नाकेबंदी आम नागरिकों के लिए कठिनाई पैदा कर रही है, जो कि स्वतंत्र आंदोलनों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। याचिकाकर्ता ने जोर देकर कहा कि सड़कों की नाकाबंदी ने शाहीन बाग मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी उल्लंघन किया, जहां सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों ने भी इसी तरह सड़कों को अवरुद्ध कर दिया था।

याचिका में कहा गया है कि जिस तरह से सार्वजनिक मार्ग अवरुद्ध करने की अनुमति के साथ किसानों का विरोध प्रदर्शन जारी है, वह न केवल शाहीन बाग मामले में शीर्ष अदालत के फैसले का उल्लंघन है, बल्कि इससे आम नागरिक को भी कठिनाई और असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।याचिकाकर्ता ने दलील दी कि नाकाबंदी भारी ट्रैफिक जाम के कारण आम नागरिक को अनावश्यक कष्ट दे रही है और लोग अपनी आजीविका कमाने के उद्देश्य से दिल्ली में आवश्यक गंतव्य तक नहीं पहुंच पा रहे हैं।

याचिकाकर्ता ने शीर्ष अदालत से सरकार को राष्ट्रीय राजधानी की सभी सीमाओं को खोलने के लिए निर्देश जारी करने का आग्रह किया। 17 दिसंबर 2020 को शीर्ष अदालत ने विरोध जताने को मौलिक अधिकार बताते हुए किसानों को हिंसा या किसी भी नागरिक के जीवन या संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के बिना विरोध जारी रखने की अनुमति दी थी।वहीं शाहीन बाग मामले में शीर्ष अदालत ने कहा था कि विरोध और असंतोष जताना एक लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन इससे आम जनता की आवाजाही अवरुद्ध नहीं होनी चाहिए।

फिलहाल कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी यूपी के छोटे किसान संगठनों के साथ दोबारा से बातचीत करने की तैयारी में हैं। क्रांतिकारी किसान यूनियन के नेता दर्शन पाल भी मानते हैं कि सरकार ने वार्ता के लिए बहुत सोच-विचारकर 15 जनवरी की तारीख तय की है।
 

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