जो बिडेन के राष्ट्रपति बनने से भारत के संबंध और व्यापार पर क्या असर पड़ेगा

 

नई दिल्ली : हाल ही में हुए अमेरिकी सीनेट चुनाव के बाद, परिणाम भी आ चुंके है, जिसका फैसला डेमोक्रेटिक पार्टी के लीडर जो बिडेन के पक्ष में आया। जिसके बाद ये कयास लगने शुरू हो गये कि आखिर जो बिडेन और भारत के बीच कैसा संबंध होगा। क्योंकि वैसे तो बिडेन पहले भी पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के नेतृत्व में उपराष्ट्रपति पद की शोभा बढ़ा चुंके है, और ओबामा भारत के बेहद करीब थे।

वैसे में अब जो बिडेन का राष्ट्रपति बनने पर भारत के साथ कैसा संबंध रहेगा, इसे लेकर चर्चा का दौर शुरू हो चुंका है। जानकारी के मुताबिक व्यापार सौदों के लिए भारत और अमेरिका के बीच जो बातचीत चल रही थी, उस पर फिर से काम होगा, ऐसे में यह प्रक्रिया लम्बी खिच सकती हैं। लेकिन, भारत और अमेरिका के बीच व्यापार संबंधों को रीसेट करने के लिए जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रीफ्रेंसेस (जीएसपी) की स्थिति को बहाल करना होगा। इसके तहत अमेरिका को 5.6 अरब डॉलर के वार्षिक निर्यात के लिए ड्यूटी फ्री एंट्री की इजाजत है।

आपको बता दें कि ट्रम्प प्रशासन ने बाजार पहुंच की कमी का हवाला देते हुए जीएसपी को रद्द कर दिया था। जब तक इसे हटाया नहीं गया, तब तक  भारत में चमड़े, आभूषण और इंजीनियरिंग जैसे श्रम प्रधान क्षेत्रों में 2,167 उत्पादों पर शून्य या कम टैरिफ के जरिए तरजीह वाले बर्ताव का फायदा लिया गया।

इसके साथ ही दोनों पक्ष कोरोनो वायरस महामारी के मद्देनजर सप्लाई चेन लचीलेपनकी जरूरत को मान्यता देंगे तो व्यापक व्यापार समझौते पर भी विचार किया जाएगा।

रणनीतिक मोर्चे की बात करें तो 2015 की संयुक्त व्यापक योजना (जेसीपीओए) में फिर से प्रवेश करना बाइडेन प्रशासन की विदेश नीति की प्राथमिकता में से एक है। इससे पाकिस्तान को दरकिनार कर भारत को चाबहार परियोजनाओं पर बढ़ने और अफगानिस्तान के लिए रणनीतिक मार्गों को सुरक्षित करने की अनुमति मिलेगी।

क्या हैं चिंताएं?

अधिकांश विश्लेषकों का मानना है कि सकारात्मक गति होगी लेकिन मोदी और बिडेन-हैरिस प्रशासन के बीच खिचांव वाला क्षेत्र मानवाधिकार से जुड़ा फ्रंट रहेगा।

कमला हैरिस और उनके 'समोसा कॉकस' (समूह का गठन करने वाले पांच भारतीय-अमेरिकी कांग्रेसपर्सन्स), विशेष रूप से कांग्रेसी महिला प्रमिला जयपाल, ने भारत के जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को रद्द किए जाने, उसके बाद इंटरनेट पाबंदियों और राजनीतिक गिरफ्तारियों की आलोचना की थी। इस वजह से खिंचाव इतना बढ़ गया था कि विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर ने पिछले साल वॉशिंगटन डीसी की यात्रा के दौरान जयपाल से मिलने से इनकार कर दिया था।

ये भी एक चिंता का विषय है कि भारत में गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को फंडिंग के संबंध में भारत के नए नियमों पर नया बाइडेन-हैरिस प्रशासन किस तरह की प्रतिक्रिया देगा।

विशेषज्ञों के अनुसार ये चिंता के क्षेत्र हैं लेकिन इनमें से अधिकतर मैनेज किए जा सकते हैं। अभी के लिए, नया प्रशासन कोविड-19 महामारी से निपटने समेत घरेलू मुद्दों को ठीक करने बिडेन के लिए प्रमुख बिंदु होगा।

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