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खेल मंत्रालय जागो: गरीबी के बलि चढ़ रही है मैकेनिक के बेटे की प्रतिभा!

नई दिल्ली: देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, लेकिन प्रतिभाओं को सम्मान और उन्हें निखारने वालों की कमी हर ओर नजर आती है। ऐसे ही कुछ देश के लाल हिमांशू ओटवाल के साथ हो रहा है। जिनके पास प्रतिभा तो है कुछ कर दिखाने की लेकिन गरीबी, तंगहाली और हमारा सड़ा हुआ सिस्टम उनकी प्रतिभा का गला रेतने पर तुला है।

हम बात कर रहे हैं पैरा टीकवोडो में गोल्ड मेडलिस्ट हिमांशू की। जो देश के लिए कुछ कर दिखाने और तिरंगे के सम्मान का जज्बा तो रखते हैं लेकिन बीच में मुफलिसी की दीवार बाधा बनकर खड़ी है। नई दिल्ली के पहाड़गंज में 4 बाई 8 के कमरे में रहने वाले हिमांशु ओटवाल के पिता सड़क पर मोटर मैकेनिक का काम कर किसी तरह परिवार को चला रहे हैं, लेकिन हिमांशु का सपना कुछ और ही है वह चाहते हैं कि मैं भी देश का नाम ऊंचा करूं। उसके लिए हिमांशु जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं, लेकिन चिंता की बात ये है कि जो फेडरशन इन खिलाड़ियों को संरक्षण देता है।

वहीँ अब अपने पास पैसे नहीं होने का रोना रो रहा है, दरअसल फेडरेशन का कहना है कि उसके पास इतने पैसे नहीं है कि वो हिमांशु के खर्चे उठा पाये। वहीँ हिमांशु के पिता इतना पैसा है नहीं कि कि वर्ल्ड पैरा टीकवोडो चैंपियन शिप लंदन में हिस्सा लेने के लिए बेटे को भेज सकें। दरअसल हिमांशु के परिजन इस चिंता में है कि वो बेटे के इस सलेक्शन की खुशियां मनाएं या पैसे न होने का कारण खेल में हिस्सा न लेने पाने का मातम। ऐसा नहीं है कि हिमांशु ने सरकार से मदद नहीं मांगी है लेकिन अफसोस सरकार भी उनको आश्वासन के लिए कुछ नहीं दे सकी है।

सबसे दिलचस्प बात है कि हिमांशु शुरू से अपने खेल मे गोल्ड के अलावा कुछ जीता ही नहीं। सवाल उठता है कि हम ओलपिंक से लेकर विश्वभर में होने वाले खेलों में गोल्ड मेडल की उम्मीद तो लगाकर खूब बैठते हैं, लेकिन खिलाडिओं पर फूटी कौड़ी खर्च नहीं करना चाहते हैं।

ऐसे में गोल्ड मेडल, सिल्वर की उम्मीद करना किसी पाप से कम नहीं है। हिमांशू के परिवार ने भारत सरकार से लेकर खेल मंत्रालय तक गुहार लगाई है लेकिन अभी किसी के कान पर जूं नहीं रेंगी है और रेंगे भी क्यों? क्योंकि हमारे सिस्टम में ही सड़ाध फैली हुई है। ऐसे में हिमांशू जैसे न जाने कितनों की प्रतिभा का सरेआम गला रेत दिया जाता है।    

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