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करुणानिधि के बारे में सब कुछ, सबसे ताकतवर सियासी घराने का सूरज अस्त!

चेन्नई: पांच बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे द्रविड़ आंदोलन की उपज और तमिलनाडु के सबसे ताकतवर सियासी घराने का सूरज आज मंगलवार को उस समय अस्त हो गया जब मुथुवेल करुणानिधि का निधन 94 साल की उम्र में कावेरी अस्पताल में हुआ। पिछले दिनों तबीयत खराब होने के बाद करुणानिधि को अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

करुणानिधि की खराब सेहत के बाद उनसे मुलाकात करने वाले नेताओं का तांता लगा था, जबकि करुणानिधि के खबार हालत और अस्पताल में भर्ती होने के कारण लगे समदे से इनके कई समर्थकों की मौत पहले ही हो चुकी है। करुणानिधि ने तमिल साहित्य, फिल्म लेखन और राजनाति में लंबी और महत्वपूर्ण पारी खेलते हुए देश भर में अपनी ऐसी पहचान कायम की है जिससे देश उन्हें जन्म-जन्मांतर तक याद रखेगा।

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साल 1969 में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम यानी डीएमके के संस्थापक सी. एन. अन्नादुरई केस निधन के बाद पार्टी की कमान संभालने वाले करुणानिधि करीब 6 दशकों के राजनीतिक समफर तमिलनाडु की सियासत का एक केंद्र की तरह रहे। वह आजीवन पार्टी के शीर्ष पर रहे। उन्होंने वह साल 1969-71, 1971-76, 1989-91, 1996-2001 और 2006-2011 तक 5 बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद पर अपनी सेवाएं दी।

अपने समर्थकों के बीच करुणानिधि 'कलाईनार' यानी 'कला का विद्वान' के नाम से मशहूर थे। उनकी पहचान फिल्म पटकथा लेखक, पत्रकार और तमिल आंदोलनकारी के तौर पर रही है, इसके अलावा उन्होंने 100 से ज्यादा किताबें भी लिखे हैं। 3 जून 1924 को तमिलनाडु के तिरुकुवालाई जन्में करुणानिधि महज 14 साल की उम्र से ही द्रविड़ आंदोलनों में शामिल होने लगे थे।

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अलागिरिस्वामी के भाषणों से प्रभावित होकर करुणानिधि ने 14 साल की उम्र में 1938 में जस्टिस पार्टी जॉइन किया। आपको बता दें कि सी. एन. अन्नादुरई ने अपने राजनीतिक गुरु ई. वी. रामास्वामी से अलग होकर 1949 में डीएमके पार्टी का गठन किया तब करुणानिधि भी उनके साथ आए। इसलिए करुणानिधि डीएमके के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं।

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साल 1957 में करुर जिले के कुलिथली सीट से जीत वह पहली बार तमिलनाडु विधानसभा पहुंचे। उन्होंने अपने क्षेत्र में खेतों में काम करने वाले मजदूरों के हक में आंदोलन चलाया और लोगों के बीच देखते ही देखते काफी लोकप्रीय हो गए। विधानसभा चुनाव में जीत और किसानों के लिए आंदोलन के कारण करुणानिधि का राजनीतिक कद तेजी से बढ़ता गया और साल 1962 में वह विधानसभा में विपक्ष के उपनेता बने।

इस बीच साल 1967 में पूरे राज्य में हिंदी भाषा थोपे जाने के खिलाफ आंदोलन में करुणानिधि ने अहम भूमिका निभाई दिसका फायदा उनकी पार्टी को विधानसभा चुनावों जीत के तौर पर मिली और राज्य में डीएमके की सरकार बनी जिसमें पहली बार करुणानिधि तमिलनाडु की अन्नादुरई सरकार में मंत्री बने थे।

यहां सुनिए करुणानिधि  का पूरा इतिहास!

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