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समलैंगिक संबंध पर सुप्रीम कोर्ट में घमासान, मोदी सरकार ने झाड़ा पल्ला

नई दिल्ली: भारत में समलैंगिक संबंध अपराध है या नहीं इस मसले पर एक बार फिर से देश की सबसे बड़ी अदालत में बहस चल रही है। देश के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई में सुप्रीम कोर्ट के पांच सदस्यों की संविधान पीठ मंगलवार से इस मामले में सुनवाई कर रहा है। इस बीच बुधवार को सरकारी की ओर से पक्ष रखते हुए अटार्नी सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वह इस मामले को कोर्ट के विवेक पर छोड़ते हैं।

मेहता ने कहा कि समलैंगिकता संबंधी धारा 377 की संवैधानिक वैधता पर कोर्ट अपने विवेक से फैसला करे। इस पर चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि, जब आपने हमारे ऊपर ही दिया है तो हम इसे तय करेंगे। वहीं चीफ जस्टिस ने कहा कि, यह मसला दो व्यस्कों द्वारा आपसी सहमति से बनाए गए संबंध से जुड़ा है।

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उन्होंने कबहा कि समहति से बनाया गया अप्राकृतिक संबंध अपराध नहीं होना चाहिए, लेकिन हम अपना फैसला बहस सुनने के बाद करेंगे। आपको बता दें कि इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिकता को वैध करार देते हुए कहा था 149 साल के कानून ने इसे अपराध बना दिया, जो मौलिक अधिकारों का हनन करता है।

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वहीं इसके बाद दिसंबर 2013 सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले में बदलाव करते हुए समलैंगिकता कतो अपराध बताया था, जिसके बाद इस मसले पर कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए नाज फाउंडेशन समेत अन्य ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है, जिसपर पुन: सुनवाई हो रही है।

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