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क्यों असफल रहा भारत का चंद्रयान 2, जानिए अंदर की बात....

नोएडा: अंतरिक्ष में भारत का महत्वकाक्षी मिशन चंद्रयान 2 सफलता के करीब जा कर चांद को गले लगाने में असफल रहा। चंद्र मिशन को उस समय तगड़ा झटका लगा, जब लैंडर विक्रम से चंद्रमा की सतह से महज दो किलोमीटर पहले इसरो का संपर्क टूट गया।

इसरो का मिशन चंद्रयान-2 भले ही इतिहास नहीं बना सका लेकिन वैज्ञानिकों के जज्बे को देश सलाम कर रहा है। इस महत्वकांक्षी मिशन के तीन मुख्य हिस्से थे, ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर।

फिलहाल लैंडर और उसके अंदर का रोवर कहां अटका है इसकी जानकारी नहीं है। लेकिन ऑर्बिटर अपना काम कर रहा है।

करीब एक साल के मिशन पर निकला ऑर्बिटर चांद की कक्षा में घुम रहा है। और ऐसी उम्मीद है कि ऑर्बिटर लापता हुए लैंडर और रोवर का पता लगा सकता है।

आइए अब समझिए आखिर लैंडर है क्या...

दरअसल, 35 किलो के लैंडर विक्रम  को भारत में अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक और इसरो के पूर्व प्रमुख डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में रखा गया है। इसी लैंडर के माध्यम से प्रज्ञान रोवर चांद की सतह पर उतरे वाला था।

इसका निर्माण एक चंद्र दिन यानी धरती के 14 दिन तक कामा करने के लिए किया गया है।

विक्रम इसरो सेंटर के साथ-साथ ऑर्बिटर और रोवर के साथ संवाद करने की क्षमता से लैस है। जिसके उपर मिशन के हिरो रोवर को चांद की सतह पर लैंडिंग कराने की जिम्मेदारी थी, लेकिन इससे पहले ही उसका संपर्क टूट गया और मिशन का हिरो रोवन प्रज्ञान अपने प्रयोग को अंजाम नहीं दे सका।

अब जरा ये भी समझिए कि इस मिशन का हिरो रोबोट रोवर क्यों कहा जा रहा है....

दरअसल, पूर्ण रूप से भारत में बना 27 किलोग्राम का रोवर, एक 6 पहिए वाला रोबोट रोवर है जिसे प्रज्ञान का नाम दिया गया है।

सौर ऊर्जा से संचालित होने वाला रोवर चांद की सतह पर उतर कर चांद का राज खंगालने वाला था।

रोवर चन्द्रमा की सतह पर अपने 6 पहियों के सहारे 500 मीटर तक चांद की सतह पर चलकर मिट्टी और चट्टानों के नमूने एकत्र करता और उनका रासायनिक विश्लेषण कर, उसकी जानकारियां ऑर्बिटर के पास भेजता।

ये जानकारियां ऑर्बिटर के माध्य से धरती पर आती। लेकिन अब क्योंकि रोवर का कोई ठिकाना नहीं है तो पूरी उम्मीद ऑर्बिटर पर ही टिकी है। हालांकि वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि ऑर्बिटर रोवर का ठिकाना खोज सकता है।

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