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मोदी सरकार के पहले भी इन सरकारों ने भी दिए थे अपर कास्ट को आरक्षण, लेकिन मिला क्यों नहीं!

नई दिल्ली: केंद्र की सत्ता पर काबिज नरेंद्र मोदी सरकार ने आगामी लोकसभा चुनाव के बीच जारी चर्चाओं के लिए सवर्णों के लिए आर्थिक आधार पर 10 प्रतिशत आरक्षण का निर्णय तो ले लिया है। लेकिन क्या सवाल है कि सरकार इसमें सफल हो पाएगी? क्या मोदी सरकार पहली ऐसी सरकार है जिसने आर्थिक आधार पर पीछड़े सवर्ण यानी अपर कास्ट के लिए भी आरक्षण की वकालत की है।

सबसे पहले क्या सरकार इसमें सफल हो पाएगी?

हां सफल हो सकती है, लेकिन इसकी राह काफी मुश्किल हो सकती है। दरअसल, संविधान के अनुसार जो आरक्षण की वय्वस्था है उसके तहत आरक्षण का पैमाना सामाजिक असमानता है, किसी की आय या संपत्ति को आरक्षण का आधार नहीं बनाया जाता है।

संविधान के अनुच्छेद 16(4) के अनुसार, आरक्षण किसी समूह को दिया जाता है, किसी व्यक्ति को नहीं। इसे लागू कराने के लिए सरकार को संविधान में संशोधन करना होगा। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तय की है जबकि सनर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए इसे 60 प्रतिशत करना होगा।

वहीं संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण दिए जाने का कोई पैमाना नहीं सेट किया गया है, इन्हीनें कारणों के चलते कोर्ट में सरकार की पकड़ ढीली पड़ जाती है। जिसे संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में संशोधन कर ठीक कर सकती है। जिसमें सिर्फ सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े होने की बात की गई है।

इन सरकारों ने भी किए हैं प्रयास

इस क्रम में सबसे पहले साल 1978 में बिहार में पिछड़ों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के साथ ही आर्थिक आधार पर सवर्णों को भी तीन फीसदी आरक्षण देने की बात तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने की थी। लेकिन कुछ समय बाद ही इस व्यवस्था को खत्म कर दी गई।

इसके बाद साल 1991 में मंडल कमीशन रिपोर्ट लागू होने के बाद पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने भी आर्थिक आधार पर 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की थी, लेकिन 1992 में कोर्ट ने इस फैसले को भी निरस्त कर दिया।

साल 2015 में राजस्थान सरकार ने अनारक्षित वर्ग के आर्थिक पिछड़ों को शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में 14 फीसदी आरक्षण देने का भरोसा दिलाया, लेकिन साल 2016 में राजस्थान हाईकोर्ट ने इस आरक्षण बिल को भी रद्द कर दिया।

वहीं साल  2016 में ही गुजरात सरकार ने सामान्य वर्ग में आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की थी। इसका लाभ लेने के लिए सरकार ने 6 लाख रुपये से कम वार्षिक आय वाले परिवारों को चुना था, लेकिन कुछ महीने बाद ही हाईकोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार दे दिया।

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