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बच्चों के व्यावसायिक यौन उत्पीड़न पर हुई बैठक, इस चुनौती से निपटने के लिए पॉलिसी एक्शन प्लान पर की गई चर्चा

NEW DELHI:- बच्चों के व्यावसायिक यौन उत्पीड़न के लिए मांग को अवरोधित करने पर पहली राष्ट्रीय स्तर की परामर्शी बैठक का आयोजन हुआ। इसमें मुद्दे को लेकर नीतियों को कम प्राथमिकता देने और उनके हल करने के लिए एक अंतर-मंत्रालयी ढांचा निर्मित करने पर चर्चा की गई। इससे नीतिगत घोषणाओं का बेहतर एवं प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित होगा।

राष्ट्रीय स्तर की परामर्शी बैठक अपनी तरह की अनूठी पहल है, जिसमें सरकार में और इससे बाहर मौजूद प्रमुख हितधारकों को एक मंच पर लाने का प्रयास किया गया। उन्होंने आचरण की कमी के मौजूदा परिदृश्य पर चर्चा की जिससे बच्चों के व्यावसायिक यौन उत्पीड़न के प्रसार को बढ़ावा मिलता है।

इस बैठक में, मुद्दे के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई, इसमें एक नेशनल एक्शन प्लान का खाका तैयार हुआ जिसमें बच्चों पर मुख्य फोकस किया गया। प्रधानमंत्री कार्यालय के तहत प्रस्तावित, यह ऐसा नेटवर्क होगा जोकि अंतर-सरकारी विभागों जैसे गृह मंत्रालय (एमएचए) और महिला एवं बाल विकास (डब्लूसीडी) को सीबीआइ जैसी अलग-अलग सरकारी एजेंसियों के साथ काम करने के लिए एक साथ लायेगा। ये सभी एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करेंगे। 

व्यावसायिक यौन उत्पीड़न में बच्चों के लिए अवरोधी मांग को प्रमुखता देते हुये, यह ढांचा मुद्दे के प्राथमिकीकरण में परिणित होगा। इसमें राष्ट्रीय एवं केन्द्र एवं राज्य सरकारों के स्तर पर खुलासे का प्रावधान होगा।

श्री राजीव चंद्रशेखर, माननीय सांसद ने कहा, ‘‘यह सिर्फ डब्लूसीडी मुद्दा नहीं है। डब्लूसीडी पहल कर सकता है लेकिन समय की जरूरत यह है कि इसे आगे बढ़ाने के लिए एक अंतर-मंत्रालयी ढांचा निर्मित किया जाये।‘‘

इस बैठक की अध्यक्षता श्री चंद्रशेखर ने की और उन्होंने कहा कि बच्चों के व्यावसायिक यौन उत्पीड़न ही नहीं बल्कि बच्चों से संबंधित अपराध के अन्य मामलों में भी तकनीक इंटेलीजेंस और डेटा साझा करने में एक इनैबलर की भूमिका निभा सकती है।

इस अवसर पर सांसद ने कहा, ‘‘हमारे पास पहले से ही नैटग्रिड है जोकि आतंक से संबंधित मुद्दों पर वाकई में जानकारी साझा करने में सक्षम बनाता है। आखिर हमारे पास इसी तरह चाइल्ड ग्रिड क्यों नहीं हो सकता जोकि एजेंसी के साथ तालमेल और इंटेलीजेंस शेयरिंग सुनिश्चित करेगा और इससे बेहतर अमल को बढ़ावा मिलेगा।‘‘

अपर्याप्त डेटा एक प्रमुख तत्व है जिस पर हमारे पूर्ण सहमति है कि कमजोर एवं अपर्याप्त अपराध रिकाॅर्ड इस क्षेत्र को कमजोर करते हैं। अधिक वक्ताओं ने कहा कि समस्या इसलिए और प्रबल हो गई है, क्योंकि आधिकारिक आंकड़े कई मुद्दों जैसे कि कलंक लगने, डर, पुलिस की उदासीनता आदि के कारण अपने आप ही कम दर्ज कराये जाते हैं।

बैठक में यह भी कहा गया कि डिजिटल मंच पर बेहतर सूचना सहयोग तंत्र की स्थापना करनी चाहिये और इसे एसएचओ स्तर पर मेंटेन किया जाना चाहिये, ‘हिस्ट्री-शीटर्स‘ पर निरंतर आंकड़े उपलब्ध होने चाहिये- यह अत्यावश्यक है क्योंकि बार-बार अपराध करने वाले अपराधी दोषमुक्त होने के कारण छूट जाते हैं।

इस सम्मेलन में एक प्रमुख थीम पर खूब चर्चा हुई कि जहां तक बच्चों के व्यावसायिक यौन उत्पीड़न की बात है तो कानूनी की कोई कमी है। हालांकि, इस मुद्दे को लेकर जागरुकता और संवेदना की कमी के साथ ही अपर्याप्त प्रवर्तन और निवारण समाधान में बाधा बन रहे हैं अथवा इस क्षेत्र में गंभीतरा को कम कर रहे हैं।

यह एक ऐसा क्षेत्र था जिस पर काफी अधिक चर्चा की गई और श्री दिलीप कुमार, संयुक्त सचिव, गृह मंत्रालय ने इस बात पर जोर दिया कि प्रवर्तन क्षमताओं को पुलिस तथा भारत की अधिकतर जांच एजेंसियों के साथ विस्तारित करने की जरूरत है। फिर भी खासतौर से जमीनी स्तर पर क्षमता निर्माण, और संवेदनशीलता बढ़ाना समय की जरूरत है।‘‘

सुश्री छाया शर्मा, डीआइजी, एनएचआरसी, (नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन) ने उपरोक्त के बारे में और व्यवस्थित एवं परिचालनीय अभाव के बारे में विस्तार से बताया कि पुलिस अधिकारी हर दिन सामना करते हैं जिसमें पीड़ितों के पुनर्वास के लिए पूंजी की कमी, इंसेंटिव एवं मनोबल का अभाव शामिल है जोकि इस क्षेत्र में प्रभावी परिचालन को बाधित करता है।

इस बैठक में एक और प्रमुख मामले पर भी जोर दिया गया और वह था न्यायपालिका की भूमिका। श्री चेतन सांघी, संयुक्त सचिव, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, ने कहा कि यह महत्वपूर्ण है कि इस तरह के बच्चों के अदालती फास्ट ट्रैक मामले बेहतर न्यायिक निवारण के तौर पर लिये जायें। उन्होंने कहा, ‘‘निवारण हमेशा महत्वपूर्ण बने रहना चाहिये....हमारे यहां विशेष अदालतों की जरूरत है और इन अदालतों को बच्चों से संबंधित मामलों को तेजी से हल करना चाहिये।‘‘ श्री सांघी ने इस बात पर भी जोर दिया कि इस खतरे के मांग पक्ष को बंद करने पर पर्याप्त ध्यान देने की जरूरत है। साथ ही पीड़ित के रिइंटीग्रेशन तत्वों पर भी फोकस करना होगा जोकि उनके मंत्रालय द्वारा लाई जा रही नई नीति की संरचना में अभिन्न हिस्सा होंगे।

उनके इस विचार का समर्थन सुश्री ज्योतिका कालरा, सदस्य, एनएचआरसी ने अपने समापन संबोधन में किया। सुश्री कालरा ने बेहतर परिणामों के लिए केन्द्र-राज्य और एजेंसी-से-एजेंसी के परिष्कृत सहयोग पर जोर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि केन्द्र और राज्य स्तरीय प्रशासन द्वारा नीतिगत कदमों को अत्यधिक दर्शनीय मीडिया कैम्पेन द्वारा समर्थन भी मिलना चाहिये ताकि इस मुद्दे के प्रति जागरुकता को पैदा करके उसे बरकरार रखा जा सके और इस थीम को राष्ट्रीय स्तर तक उन्नत बनाय जा सके। इससे नीति निर्माता इस मुद्दे को राष्ट्रीय जन नीति प्राथमिकता का दर्जा देने के लिए तत्पर होंगे।

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