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प्रसून वाजपेयी का वीडियो, सवालो के घेरे में मोदी सरकार PMO और भाजपा दफ्तर!

नई दिल्ली: हम ने तो सुना था, शायद आपने भी सुना होगा कि लोकतंत्र के चार पायों में से एक पाया पत्रकारिता होता है, जो अन्य तीन पायों की खामियों को उजागर करता है, ताकि समय रहते उनकी मरम्मत की जा सके और और इन चार पायों पर टीके देश की संसद (जिसे लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है) को बचाया जा सके।

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लेकिन यहां एक पाया सभी पायों पर हावी होता दिख रहा है। इससे पहले की इस पूरे मामले को विस्तार से बताए ये जानिए कि लोकतंत्र के चार पाये विधायिका, कार्यपालिका, न्‍यायपालिका और पत्रकारिता हैं। विधायिका यानी नेता और मंत्री, कार्यपालिका यानी पुलिस और प्रशासन, न्‍यायपालिका यानी कोर्ट और पत्रकारिता यानी पत्रकार।

अब यहां समझने वाली बात है कि लोकतंत्र के लिए दुनिया भर में मशहूर भारत देश में इन दिनों जिस तरह के मामले सामने आ रहे हैं उससे ऐसा प्रतीत होता है कि विधायिका यानी नेताओं और मंत्रियों का दबाव अन्य तीनों पायों पर बढ़ता ही जा रहा हैं। ऐसे कई मामले सामने आए जिनमें ऐसा दिखता है कि अगर आप सरकार की बीन बजाते हैं तब तो ठीक है अन्यथा आपकी ईंट से ईंट बजा दी जाएगी।

और ऐसा सिर्फ आकलन नहीं लगा रहे बल्कि इसके सबूत भी हैं! दरअसल, देश के एक जाने माने पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी के साथ इन दिनों कुछ ऐसा ही हो रहा है। पिछले दिनों खबर आई एक प्रमुख मीडिया संस्थान ने पुण्य प्रसून वाजपेयी समेत अपने तीन वरिष्ठ पत्रकारों को चैनल से बाहर का रास्ता दिखा दिया या इसके लिए मजबूर कर दिया।

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चैनल से पत्रकारों को निकाले जाने का मामला देश की संसद में भी उठाया गया, लेकिन सरकार ने इन आरोपों को खारिज कर दिया। सरकार पर आरोप है कि इन पत्रकारों को चैनल से निकालने के लिए दबाव बनाया गया, क्योंकि ये पत्रकार सरकार की नाकामियों को खोज-खोज लाते और टीव पर बैठकर जनता के सामने उटल देते।

विपक्ष के नेता ने संसद में सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि मौजूदा सरकार को आलोचना पसंद नहीं है जिसके कारण वे ऐसा कर रही है, वहीं सरकार की ओर से मंत्री ने कहा कि विपक्ष के पास कोई और मुद्दा नहीं है तो वे हर काम के लिए सरकार को ही जिम्मेदार बताते हैं।

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वहीं सोशल मीडिया पर प्रसून वाजपेयी का एक वीडियो भी वायरल हो रहा है, जिसमें प्रसून वाजपेयी ये कह रहा है कि पत्रकारिता पर सत्ता का दबाव हमेशा से रहा है, लेकिन हाल के दिनों में ये काफी बढ़ चुका है। वाजपेयी ने कहा कि पहले ऐसे संकेत दिए जाते थे कि ये सरकार को पसंद नहीं है और संपादक उसे खबरों की लिस्ट से हटा देता था, लेकिन अब नापसंद होने पर सीधा फोन आ जाता है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि ये फोन प्रधानमंत्री कार्यायाल यानी पीएमओ या फिर बीजेपी दफ्तर या कहीं और से भी आ सकता है।

यहां सुनिए प्रसून वाजपेयी ने क्या कहा!

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