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आखिरी क्यों हुई थी भारत-पाकिस्तान के बीच 1971 की जंग, नहीं जानते होंगे ये बातें!

नई दिल्ली: पूरा देश आज ‘विजय दिवस’ मना रहा है। इस खास अवसर पर देश की जनता अपने वीर जवानों के सैर्य का गुनगाण कर रहे हैं। लोग अगल-अलग तरीके से देश की हिफाजत करते हुए अपनी जान की बाजी लगाने के वाली सेना को नमन कर रहे हैं। आज 16 दिसंबर है और आज ही के दिन साल 1971 की जंग में भारत ने पाकिस्तान को घुंटने टेकने पर मजबूर किया था।

आपको यह जानकार हैरानी हो सकती है कि जो पाकिस्तान हर मौके पर भारत को जंग की गीदड़ भभकी देता है, वो 1971 की जंग में 14 दिन भी भारतीय सेना का सामना नहीं कर सकती थी। हालांकि इसके बाद भी कई ऐसे मैके आए जब भारत ने पाकिस्तान को जंग के मैदान में ढेर किया, लेकिन इसके बाद भी पाकिस्तान अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आ रहा।

साल 1971 के आखिरी महीने के आरंभ में पाकिस्तान की नापक हरकतों के कारण शुरू हुई जंग में भारतीय सेना ने 13 दिन बाद ही 14 दिन पाकिस्तानी सेना को सरेंडर करने पर मजबूर कर दिया। इस युद्ध में 3800 से अधिक भारतीय सौनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी, लेकिन मौत की परवाह किए बिना भारतीय सेना ने पाकिस्तान के 93 हजार जालिम सैनिकों को आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर दिया।

इस युद्ध का आरंभ पाकिस्तानी सेना द्वारा नागरिकों पर जुल्म से होता है। दरअसल, पाकिस्तानी सरकार और सेना पूर्वी पाकिस्तान में रहने वाले अपने ही नागरिकों पर जुल्म ढा रही थी। बेगुनाहों की निर्मम हत्या की जा रही थी। जिसके खिलाफ लोगों ने सेना के खिलाफ बगावत छेड़ दी थी। जिसे दबाने के लिए पाकिस्तान ने नरसंहार शुरू कर दिया, लोग अपनी जान बचाने के लिए यहां वहां भाग रहे थे।

पाकिस्तान के जुल्म से बचने के लिए लाखों की संख्या में भारत की ओर बढ़ चले। ऐसे में उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर भी दबाव बढ़ने लगा। हालात की नजाकत देखते हुए इंदिरा ने भारतीय सेना तो अंदर ही अंदर जंग के लिए तैयार रहने को कहा और दूसरी ओर से पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव की कोशिश भी शुरू कर दी। थलसेनाध्यक्ष सैम मानेकशॉ की मौजूदगी में अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर के साथ बैठक की और इंदिरा ने साफ कर दिया कि अगर अमेरिका पाकिस्तान को नहीं रोक सकता तो भारत सैन्य कार्रवाई के लिए मजबूर होगा।

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हालांकि भारत की परेशानियों के समझने के बाद भी अमेरिका अपने नरम रूख पर कायम रहा। इसी बीच 9 अगस्त 1971 को इंदिरा ने सोवियत संघ के साथ एक ऐसा समझौता किया जिसके तहत दोनो देशों ने एक दूसरे की सुरक्षा का भरोसा दिलाया। लेकिन इधर पूर्वी पाकिस्तान में हालात बद से बदतर होते जा रहे थे। पुलिस, पैरामिलिट्री फोर्स, ईस्ट बंगाल रेजिमेंट और ईस्ट पाकिस्तान राइफल्स के बंगाली सैनिकों ने भी पाकिस्तानी सेना के खिलाफ बगावत छेड़ दी।

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पाकिस्तानी सेना के खिलाफ बगावत करने वाले लोगों को भारत से उम्मीद थी। इसी दौरान भारत की ओर से लोगों को फौज की ट्रेनिंग मिलने लगी और फिर मुक्ति वाहिनी सेना का जन्म हुआ। जिसने युद्ध में अहम भूमिका निभाई। हालांकि पाकिस्तान चाहता तो जंग रोक सकता था। लेकिन उस समय पाकिस्तान की हालत ऐसी थी जैसे, “जब नाश मनुष्य पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है” पाकिस्तान, चीन और अमेरिका के दम पर लगतारा भारत को उकसाता रहा।

नवंबर महीने के आखिरी दिनों में पाकिस्तान के विमान बार-बार में भारतीय हवाई सीमा में दाखिल होने लगे और भारत को जंग के लिए उसकाते रहे। जिसके बाद भारत ने पाकिस्तान को चेतावनी दी तो आदत से बाज आने के बजाय पाकिस्तानी राष्ट्रपति याहिया खान ने 10 दिनों के अंदर जंग की धमकी दे डाली, लेकिन शायद पाकिस्तान को पता नहीं था कि भारत पहले ही युद्ध के लिए तैयर है।

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इस दौरान पाकिस्तान ने एक और बड़ी गलती कि, पाकिस्तानी सेना ने 3 दिसंबर 1971 को भारतीय शहरों पर बमबारी कर दी। भारत पर हमले की खबर मिलते ही इंदिरा गांधी मैप रूम में पहुंची और हालात का जायजा लेने के तुरंत बाद कैबिनेट की बैठक बुलाई और विपक्ष को पूरे मामले से अवगत कराया। इस दौरान रात के 11 बज रहे थे। बैठक के बाद आधी रात को इंदिरा ने ऑल इंडिया रेडियो के जरिए पूरे देश को संबोधित किया।

इंदिरा ने भारतीय सेना को ढाका की ओर बढ़ने का आदेश दिया। जिसके बाद पहले से तैयार की गई नीतियों के आधार पर भारतीय वायुसेना ने पश्चिमी पाकिस्तान के अहम ठिकानों और हवाई अड्डों पर बमबारी शुरू कर दी। देखते ही देखते भारत की तीनों सेनाओं ने पाकिस्तान को पूरी तरह से घेर लिया और 3 दिसंबर के हमले का जवाब में भारत ने आपरेशन ट्राइडेंट शुरु किया।

4दिसंबर 1971 को आपरेशन ट्राइडेंट शुरू हुआ और भारतीय नौसेना ने भी युद्ध के दो मोर्चे संभाले। नैसेना बंगाल की खाड़ी में समुद्र की ओर से पाकिस्तानी नौसेना और पश्चिमी पाकिस्तान की सेना पर हमला बोल दिया। 5 दिसंबर को भारतीय नौसेना ने कराची बंदरगाह पर जमकर बमबारी की और पाकिस्तानी नौसैनिक मुख्यालय को बर्बाद कर दिया। इसी दौरान इंदिरा गांधी ने ‘बांग्लादेश’ एक नाये देश को मान्यता देने का एलान कर दिया।

आपको बता दें कि भारत ने युद्ध में जीत से पहले ही ये फैसला इसलिए किया ताकि युद्धविराम की स्थिति में बांग्लादेश का मामला यूनाइटेड नेशन्स में अटक न जाए। आपको बता दें कि दौरान अमेरिका और चीन ने पाकिस्तान की काफी मदद की। अमेरिका ने तो पाकिस्तान की मदद के लिए अपनी नौसेना का सबसे शक्तिशाली सातवां बेड़ा बंगाल की खाड़ी की ओर रवाना कर दिया।

लेकिन इस दौरान इंदिरा द्वारा सोवियत संघ के साथ हुई संधि का फायदा भारत को मिला और अमेरिकी नौसेना को जवाब देने के लिए उन्होंने भी अपने जंगी जहाजों को हिंद महासागर की ओर रवाना करने का आदेश दिया। इस तरत इस जंग में दो महाशक्तियां भी अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हो चुकी थीं।

इस बीच इंदिरा गांधी ने फैसला किया कि अमेरिकी बेड़े के भारत के करीब पहुंचने से पहले पाकिस्तानी सेना को सरेंडर कराना होगा। जिसके बाद थल सेनाध्यक्ष जनरल सैम मानेक शॉ ने पाकिस्तानी सेना को समर्पण की चेतावनी दी। लेकिन चीन और अमेरिका के दम पर उछल रहे पाकिस्तान ने भारत की चेतावनी खारिज कर दी। लेकिन इस दौरान पाकिस्तान पूरी तरह से भारत के घेरे में आ चुका था।

इस बीच 14 दिसंबर को भारतीय सेना ने ढाका में पाकिस्तानी गवर्नर के घर पर हमला बोल दिया, जहां पाकिस्तान के सभी बड़े अधिकारी गुप्त बैठक के लिए जमा हुए थे। इस हमले से पाकिस्तानी फौज के हौसले पस्त पड़ गए और पाकिस्तानी जनरल नियाजी ने भारत के सामने युद्ध विराम का प्रस्ताव रखा, लेकिन भारतीय थलसेनाध्यक्ष सैम मानेकशॉ ने युद्ध विराम का संदेश ठुकराते हुए पाकिस्तान को सरेंडर करने का आदेश दिया।

इसके बाद कोलकाता से भारत के पूर्वी कमांड के प्रमुख लेफिटेनेंट जेनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ढाका पहुंचे और फिर अरोडा ने नियाजी के साथ बैठक किया और 16 दिसंबर 1971 को दोपहर के करीब 2.30 बजे बज रहे थे तब सरेंडर की प्रक्रिया शुरू हुई। इस दौरान पकिस्तानी कमांडर नियाजी ने सबसे पहले लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा के सामने सरेंडर के कागजात पर साइन किया और अपने बिल्ले उतार दिया। साथ ही नियाजी ने अपना रिवॉल्वर भी जनरल अरोड़ा के हवाले कर दिया।

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