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जम्मू-कश्मीर पर शाह के दो बड़े फैसले, संसद में पेश किया प्रस्ताव

नई दिल्ली: केंद्र की सत्ता संभालने के बाद अपने पहले दौरे से लौटे गृह मंत्री अमित शाह ने शुक्रवार को जम्मू कश्मीर को लेकर दो अहम प्रस्ताव लोकसभा में पेश किए। जिनमें से पहला प्रस्ताव राज्य में राष्ट्रपति शासन बढ़ाने और दूसरा आरक्षण के कानून में संशोधन का प्रस्ताव है। आइए विस्तार से बताते हैं आखिर कश्मीर को लेकर मौजूदा मोदी सरकार की नीति है क्या?

सदम में प्रस्ताव पेश करते हुए शाह ने कश्मीर में जारी राष्ट्रपति शासन और आरक्षण संसोधन को लेकर विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि ये प्रयास राज्य में शांति बहाली के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है। गृह मंत्री ने बताया कि 2 जुलाई से 6 माह के लिए राष्ट्रपति शासन को बढ़ाया जाने का प्रस्ताव है।

उन्होंने कहा कि पीडीपी सरकार के पास बहुमत नहीं रहा, जिसके कारण राज्यपाल ने सभी दलों से बात कर राष्ट्रपति शासन का फैसला लिया है। शाह ने कहा कि विधायकों की खरीद-फरोख्त के मामले आने के बाद 21 नवंबर 2018 को विधानसभा को भंग कर दिया गया और उसके बाद 20 दिसंबर 2018 से राष्ट्रपति शासन राज्य में अमल में है।

सदन को जानकारी देते हुए शहा ने कहा कि जम्मू-कश्मीर मेंल राष्ट्रपति शासन को 3 जनवरी 2019 को राज्यसभा ने समर्थन किया जो 2 जुलाई 2019 तक रहेगा। लिहाजा हम प्रस्ताव लेकर आए हैं कि राष्ट्रपति शासन 6 महीने के लिए बढ़ाया जाए। वहीं शाह ने जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव नहीं कराये जाने को लेकर भी स्थिती साफ की। उन्होंने कहा कि रमजान और अमरनाथ यात्रा को ध्यान में रखते हुए चुनाव आयोग चुनाव कराने का फैसला बाद में करेगा।

सदन को भरोसे में लेते हुए शाह ने कहा कि मौजूदा स्थिति के अनुसार जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन बढ़ाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। उन्होंने कहा कि 7 मई से 4 जून रमजान का महीना था और 30 जून से अमरनाथ यात्रा शुरू हो रही है। वहीं शाह ने बताया कि मौजूदा समय में बकरवाल समुदाय के लोग पहाड़ पर चले जाते हैं। ऐसे में चुनाव कराना ठीक नहीं है, लिहाजा हमने राष्ट्रपति शासन बढ़ाया जाने की मांग की है।

साथ ही शाह ने उम्मीद जताई कि इस समय अवधि में हम जम्मू-कश्मीर में चुनाव उपयुक्त माहौल बनाने में सफल होंगे। उन्होंने कहा कि इस साल के अंत तक राज्य में विधानसभा चुनाव कराये जा सकते हैं। लेकिन फिलहाल चुनाव आयोग ने चुनावी तारिखों की घोषणा नहीं की है। हालांकि कश्मीर में राष्ट्रपति शासन बढ़ाये जाने के फैसले से नाराज विपक्ष ने तिखी प्रतिक्रिया दी है। सरकार के फैसले पर पलटवार करते हुए मनीष तिवारी ने कहा इसकी वजह 2015 में पीडीपी और बीजेपी गठबंधन में छिपी है।

आपको बता दें कि बीते काफी समय से आंतरिक अशांति से जूझ रहे जम्मू-कश्मीर में शांति बहाली एक अनसुलझी पहेली के समान दिख रही है। अपने किए वादों के अनुसार सरकार कश्मीर में शांति की योजना बना रही है, लेकिन आंतकियों और अलगाववादियों का अड़ियल रवैया सरकार के प्रयासों पर लगतार पानी फेरता दिख रहा है। ऐसे में सरकार के ये प्रयास कश्मीर की फिजा दुरुस्त करने में किस कदर मददगार साबित होगा ये आने वाला वक्त ही बताएगा।

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