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7वें चरण की वोटिंग से पहले चुनाव आयोग का कठोर फैसला, तिलमिला उठी ममता समेत ये सभी पार्टियां

नई दिल्ली: सियासी महासमर अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहा है। अंतिम चरण में 9 राज्यों की 59 लोकसभा सीटों के लिए 19 मई को वोटिंग होनी है। लेकिन इससे पहले बंगाल में सियासी हिंसा के शोले भड़क रहे हैं। लिहाजा चुनाव आयोग को वो करना पड़ा जो आजाद भारत के इतिहास में शायद अब से पहले कभी नहीं हुआ।

दरअसल, अंतिम चरण के चुनाव से पहले मंगलवार को कोलकाता में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो में भड़की हिंसा का हिसाब-किताब लगाने के बाद चुनाव आयोग ने तय समय से पहले ही चुनावी प्रचार-प्रसार रोके जाने का फर्मान सुना दिया है। पहले से तय कार्यक्रम के अनुसार अंतिम चरण के लिए चुनाव प्रचार का अंतिम दिन 17 मई की शाम 6 बजे तक था लेकिन अब इसे करीब 19 घंटे पहले 16 मई की रात 10 बजे तक कर दिया गया है।

चुनाव आयोग की इस कार्रवाई से बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समेत अन्य पार्टियां भी लाल-पीली पड़ गई हैं। आयोग के फैसले पर पलटवार करते हुए टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी ने इस पक्षपाती बताया। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग में आरएसएस के लोग हावी हैं, ये फैसले बीजेपी के दबाव में लिए जा रहे हैं।

वहीं चुनाव आयोग के खिलाफ जंग में ममता को कांग्रेस समेत अन्य विरोधी दलों से भी समर्थन मिल रहा है। कुल मिलाकर सियासी दलों के लफड़े में चुनाव आयोग को भी घसीटा जा रहा है। सिर्फ विपक्ष ही नहीं बल्कि सत्ताधारी बीजेपी भी चुनाव आयोग पर अगल तरीके से निशाना साध रही है। बीजेपी अध्यक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग को बंगाल में संभावित हिंसा का आनुमान था, लेकिन इसके बाद भी आयोग बंगाल में हो रही चुनावी हिंसा पर आंख मूंदे मुकदर्शक बनी रही।

हालांकि चुनाव आयोग पर ममता के गुस्से की एक मात्र वजह प्रचार की अवधि में कटौती करना ही नहीं बल्कि ममता बनर्जी के गुस्से का सबसे बड़ा कारण है कि अंतिम चरण के चुनाव से पहले आयोग ने बंगाल की प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ी चोट करते हुए ममता के करीबी कहे जाने वाले मुख्य गृह सचिव अत्री भटाचार्या को छुट्टी पर भेज दिया है। जबकि एडीजी (सीआईडी) राजीव कुमार को दिल्ली गृह मंत्रालय तलब किया है। उन्हें गुरुवार सुबह 10 बजे तक दिल्ली रिपोर्ट करने का आदेश दिया गया है।

आपको बता दें अंतिम चरण की वोटिंग से पहले चुनाव आयोग द्वारा की गई कार्रवाई चुनावी समर के बीच किसी राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था पर की गई सबसे बड़ी कार्रवाई है। वहीं शायद आजाद भारत के इतिहास में ऐसा भी पहली बार हुआ जब राजनीतिक दलों की हिंसा से आहत आयोग को प्रचार-प्रसार की तय समय में भी कटौती करनी पड़ी है।

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