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यहां देखिए- राफेल डील फ्रांस के मौजूदा राष्ट्रपति एमैनुएल क्या कह रहे हैं...

संयुक्त राष्ट्र: भारत और फ्रांस के बीच हुए 36 राफेल विमानों के कारार के मसले पर भारत की सत्ता पर काबिज नरेंद्र मोदी सरकार विपक्ष के निशाने पर हैं, वहीं फ्रांस में भी राफेल मुद्दे की जमकर चर्चा चल रही है। मामले पर पिछले काफी दिनों से जारी विवादों के बीच पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद द्वारा हाल ही में दिए गए बयान के आधार पर डील में गड़बड़ी की आशंका जताई जा रही है।

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फ्रांस्वा ओलांद ने अपने बयान में कहा कि था कि राफेल करार में भारतीय कंपनी का चयन भारत सरकार के इशारे पर किया गया था। ओलांद के अनुसार सरकार ने ही इस डील में भारतीय उद्योगपति अनिल अंबानी को शामिल करने के प्रस्ताव दिया था लिहाजा हमारे पास कोई विकल्प नहीं थी। वहीं अब फ्रांस के मौजूदा राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रों ने कहा है कि राफेल करार ‘सरकार से सरकार’ के बीच तय हुआ था।

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उन्होंने कहा कि भारत और फ्रांस के बीच 36 लड़ाकू विमानों को लेकर जब अरबों डॉलर के इस करार पर मुहर लगी थी तब मैं सत्ता में नहीं था, इसलिए इस विषय पर मैं अधिक नहीं कह सकता। बता दें कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र के इतर एक प्रेस कांफ्रेंस में मैक्रों से सवाल किया गया कि क्या भारत सरकार ने फ्रांस सरकार या फ्रांस की दिग्गज एयरोस्पेस कंपनी दसाल्ट से कहा था कि राफेल करार के लिए भारतीय साझेदार के तौर पर रिलायंस को चुनना है।

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जिसके जवाब में फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने कहा कि ये करार सरकार से सरकार के बीच था और जब ये हुआ मैं सत्ता में नहीं था। लिहाजा इस विषय पर मैं और कुछ नहीं कह सकता। उन्होंने कहा कि यह करार एक व्यापक ढांचे का हिस्सा है जो भारत एवं फ्रांस के बीच सैन्य एवं रक्षा गठबंधन है। वहीं भारत सरकार भी इस विषय पर कुछ भी खुलकर नहीं बोल रही है, लिहाजा विपक्ष के आरोप भी काफी हद तक सही लगते हैं।

विपक्ष का आरोप है कि अनिल अंबानी कंपनी ने आज तक विमान का पंखा भी नही बनाया है फिर किस बात से प्रभावित हो कर लड़ाकू विमान के इस डील में उसे साझेदार बनाया गया। विपक्ष के अनुसार, यह देश, देश की सुरक्षा के साथ धोखा है। यह एक तरह से देश का बड़ा घोटाला है।

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आपको बता दें कि भारत ने करीब 58,000 करोड़ रुपये की लागत से 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीदने के लिए पिछले साल सितंबर में फ्रांस के साथ अंतर-सरकारी करार किया है। इससे करीब डेढ़ साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पेरिस यात्रा के दौरान इस प्रस्ताव का ऐलान किया था और अब साल 2019 के सितंबर महीने से इसकी आपूर्ति होने वाली है, लेकिन इससे पहले इस डील पर बड़े पैमाने पर अनियमितता की दुर्गंध आ रही है, लिहजा सरकार को इस पर अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए।

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