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चार हाथे वाले हॉकी के जादूगर की अनसुनी बातें- हिटलर के इस ऑफर को भी मारा था लात...

नई दिल्ली: पूरी दुनिया में हॉकी के जादूगर के नाम से मशहूर मेजर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 को इलाहाबाद के राजपूत घराने में हुआ था। इस हिसाब से आज 29 अगस्त 2017 को ध्यानचंद की 112वीं जयंती मनाई जा रहा है। ध्यानचंद के जन्मदिन को पूरा देश खेल दिवस के रुप में मनाता है। हॉकी के जादूगर के जयंती पर आज मेजर ध्यानचंद से जुड़ी कुछ खास जानकारी देने जा रहे हैं।

ध्यानचंद के 112वीं जयंती पर देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनके कौशल के दम पर भारतीय हॉकी में कई अनोखे कारनामें हुए हैं। इसके साथ ही पीएम ने आज राष्ट्रीय खेल प्रतिभा खोज पॉर्टल का शुभारंभ किया है। यह पॉर्टल देश के युवाओं को खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए सही दिशा और सहयोग देने का काम करेगा।

इलाहाबाद के राजपूत घराने जन्में हॉकी के जादूगर ध्यानचंद को फुटबॉल में पेले और क्रिकेट में ब्रैडमैन के समान ही माना जाता है। हॉकी के मैदान में ध्यानचंद का प्राकर्म किस चमत्कार के समान होता था, जो हर देखने वालों के दिल में अपनी एक अलग ही छाप छोड़ जाता था।

जब वे हॉकी लेकर मैदान में उतरते थे तो गेंद इस तरह उनकी स्टिक से चिपक जाती थी जैसे वह किसी जादू की स्टिक लेकर हॉकी खेल रहे हैं। ध्यानचंद प्रारंभिक शिक्षा के बाद 16 साल की उम्र में साधारण सिपाही के तौर पर भर्ती हुए थे।

जब 'फर्स्ट ब्राह्मण रेजीमेंट' में उनकी भर्ती हुई थी, तब उनके मन में हॉकी के प्रति कोई खास दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन बाद में ध्यानचंद ने तीन ओलिम्पिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया और तीनों बार देश को स्वर्ण पदक दिलाया।

भारत ने 1932 में 37 मैच में 338 गोल किए, जिसमें 133 गोल ध्यानचंद के नाम पर दर्ज किए गए, ध्यानचंद ने 1928 (एम्सटर्डम), 1932 (लॉस एंजिल्स) और 1936 (बर्लिन) में लगातार तीन ओलिंपिक खेलों में भारत को हॉकी में गोल्ड मेडल दिलाया।

बता दें कि 21 साल की उम्र में ही उन्हें न्यूजीलैंड जाने वाली भारतीय टीम में चुन लिया गया। इस दौरे में भारतीय सेना की टीम ने 21 में से 18 मैच जीते थे, 23 साल की उम्र में ध्यानचंद 1928 के एम्सटरडम ओलंपिक में पहली बार हिस्सा ले रही भारतीय हॉकी टीम के सदस्य रहे, जहां चार मैचों में भारतीय टीम ने 23 गोल दागे।

साल 1932 में लॉस एंजिल्स ओलंपिक में भारत ने अमेरिका को 24-1 के रिकॉर्ड अंतर से हराया। इस मैच में ध्यानचंद और उनके बड़े भाई रूप सिंह ने आठ-आठ गोल दागे थे। 1936 के ओलंपिक खेल शुरू होने से पहले एक अभ्यास मैच में भारतीय टीम जर्मनी से 4-1 से हार गई थी।

इस हार को लेकर ध्यानचंद ने अपनी आत्मकथा 'गोल' में लिखा,"मैं जब तक जीवित रहूंगा इस हार को कभी नहीं भूलूंगा, इस हार ने हमें इस कदर हिला कर रख दिया कि हम पूरी रात सो नहीं सके। 1936 के बर्लिन ओलंपिक में ध्यानचंद भारतीय हॉकी टीम के कप्तान थे। 15 अगस्त,1936 को हुए फाइनल में भारत ने जर्मनी को 8-1 से मात देने में कामयाबी हासिल की।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार साल 1968 में भारतीय ओलंपिक टीम के कप्तान रहे गुरुबख़्श सिंह ने बताया कि 1959 में 54 साल के उम्र में भी भारतीय हॉकी टीम का कोई भी खिलाड़ी उनसे गेंद नहीं छीन सकता था। हालांकि 1948 में उन्होंने 43 साल की उम्र में ही अंतरराट्रीय हॉकी को अलविदा कह दिया।

हॉकी में उनके योगदान को देखते हुए उनके जन्मदिन 29 अगस्त को भारत का राष्ट्रीय खेल दिवस घोषित किया गया है। इसी दिन खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार अर्जुन और द्रोणाचार्य पुरस्कार भी प्रदान किए जाते हैं। भारतीय ओलम्पिक संघ ने ध्यानचंद को शताब्दी का खिलाड़ी घोषित किया था।

यही नहीं हिटलर ने स्वयं ध्यानचंद को जर्मन सेना में शामिल कर एक बड़ा पद देने की पेशकश की थी, लेकिन उन्होंने भारत में ही रहना पसंद किया, और हिटलर के इस ऑफर को लात मार दी थी। बता दें कि वियना के एक स्पोर्ट्स क्लब में उनकी एक मूर्ति लगाई गई है, जिसमें उनको चार हाथों में चार स्टिक पकड़े हुए दिखाया गया है।

लेकिन इसके बाद 3 दिसंबर, 1979 को पूरी दुनिया की आंखे नम हो गई थी, जब हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद ने अपनी आंखे बंद कर दी और इस दुनिया से विदा हो गए। दिल्ली में देहांत के बाद झांसी में उनका अंतिम संस्कार किसी घाट पर न होकर उस मैदान पर किया गया  जहां वे हॉकी खेला करते थे। 

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