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'राम जन्मभूमि' पर आधारित इस 'पुस्तक' के आने से राजनीतिक जगत में मची हड़कंप

नई दिल्ली : रामजन्मभूमि एक ऐसा विवाद जो कि बहुत ही लंबें समय से चला आ रहा हैं जिसका अभी तक कोई समाधान नहीं मिला हैं। लेकिन इन दिनों मार्केट में एक ऐसी पुस्तक आई हैं, जिसे पढ़ने के बाद ये महसूस होता हैं कि यहीं एक पुस्तक हैं जो वर्षों से मानव मस्तिषक पर पड़े धूल को छांटने का काम करती हैं। आप भी पढ़िए इसके कुछ अंश। आपको बता दें कि इस पुस्तक को हेमंत शर्मा ने लिखा हैं जिन्होंने राम जन्मभूमि पर अपनी पैनी नज़र रखी थी। बता दें कि इस पुस्तक का नाम ' अयोध्या में राम' हैं।

आपको बता दें कि, किताब के लेखक ने पूरी ईमानदारी बरतते हुए लिखा है, "अपना यह दावा बड़बोलापन होगा कि यह किताब अयोध्या के सच का सौ टका शुद्ध दस्तावेज़ होगी।"

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लेखक का कहना है कि "आग्रह, दुराग्रह से परे, जो देखा, सब लिख दिया", लेकिन शुरुआत से आख़िर तक पूरी किताब में बाबरी मस्जिद को 'विवादित ढाँचा' ही लिखा है। जबकि पूरा विवाद ही इस बात पर केंद्रित है कि 1526 में जिस इमारत का निर्माण किया गया उसे मुसलमान मस्जिद मानते हैं और हिंदू कहते हैं मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी। बहुत सारे लोग अगर उसे जन्मभूमि मानते हैं तो बहुत सारे लोग मानते हैं कि 6 दिसंबर 1992 तक उस जगह पर मस्जिद खड़ी थी जिसके भीतर 1949 में चुपके से मूर्तियाँ रखकर भजन-कीर्तन शुरू किया गया।

संघ परिवार बाबरी मस्जिद को विवादित ढाँचा कहता आया है. मस्जिद के ध्वंस के बाद संसद में हुई हर बहस में जब-जब बाबरी मस्जिद कहा गया तब तब भारतीय जनता पार्टी के सांसद उसे बाबरी ढाँचा या विवादित ढाँचा कहने पर अड़ गए। उनकी दलील थी कि अगर वहां वर्षों से नमाज़ नहीं पढ़ी जा रही थी तो उसे मस्जिद क्यों कहा जाए?

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लेकिन सिर्फ़ एक उदाहरण भर से 'युद्ध में अयोध्या' किताब का झुकाव सिद्ध नहीं होता। इस किताब में आए-गए राजनीतिक व्यक्तियों के चरित्र चित्रण से भी पता चलता है कि लेखक की नज़र में कौन काइयाँ, धोखेबाज़ और दोहरे चरित्र वाला है और कौन-कौन सी शख़्सियत रामलला की मुक्ति के लिए अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभा रही थीं।

पुस्तक के अनुसार विश्वनाथ प्रताप सिंह 'कुटिल राजनेता' हैं तो राजीव गाँधी 'चंपुओं से घिरे' और 'कोई राय न रखने वाले' नेता और पीवी नरसिंहराव की सरकार 'चालबाज़ और अहंकारी' है। आज़म ख़ान की 'ज़बान छुरी की तरह चलती है' लेकिन जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने 'नफ़रत और बदले की भावना से भरे' लाखों कारसेवकों को गोलबंद करके अयोध्या कूच करने के लिए उकसाया उनके लिए किताब में या तो तारीफ़ है, या फिर जहाँ कड़ी आलोचना की गुंजाइश है, वहाँ उनके बारे में साफ़ राय ज़ाहिर नहीं की गई है।

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पर किताब में इस बात का विस्तृत ब्यौरा दिया गया है कि विवादित स्थल का ताला खुलवाने से लेकर बाबरी मस्जिद के ध्वंस तक काँग्रेस पार्टी ने क्या-क्या पैंतरे खेले और किस तरह हिंदुत्व की लहर पर सवार होने की कोशिश की।

एक रिपोर्टर की बारीक नज़र से देखी गई घटनाओं का परत-दर-परत ब्यौरा देने में पूरी ईमानदारी बरतना इस किताब की ताक़त है। कोई हिंदी भाषी पाठक अगर मंदिर-मस्जिद विवाद से जुड़ी तमाम जानकारियों को हासिल करना चाहता है तो इस किताब में सब कुछ मिलेगा. ख़ास तौर पर बाबरी मस्जिद ढहाए जाने से पहले, उस दिन और उसके बाद की मिनट-दर-मिनट जानकारी हेमंत शर्मा ने भरपूर ईमानदारी से सामने रखी है।

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इस किताब से पता चलता है कि काँग्रेस ने कैसे अपने दुष्कर्मों से भारतीय जनता पार्टी को और सांप्रदायिक राजनीति को उत्तर भारत में अपने पैर पसारने का मौक़ा दिया। हेमंत याद दिलाते हैं कि सांप्रदायिक राजनीति के लिए संघ परिवार और भारतीय जनता पार्टी को ही ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि 1981 में मीनाक्षीपुरम में धर्मपरिवर्तन की घटना के बाद डा. कर्ण सिंह और दाऊदयाल खन्ना जैसे काँग्रेसी नेता विश्व हिंदू परिषद एक साथ हिंदू समाज को एकजुट करने की मुहिम में जुट गए थे।

सत्ता पक्ष और विपक्ष के भीतरी हलक़ों तक लेखक की पहुँच के कारण भी उनके कई मुश्किल काम आसान हुए होंगे।

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ये सच है कि राजीव गाँधी ने मुसलमानों को रिझाने के लिए शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को संसद में क़ानून बनाकर पलट दिया। लेकिन फिर हिंदुओं के भड़कने के ख़तरे को देखते हुए एक के बाद एक कई ऐसे काम किए जिससे उनकी राजनीतिक दृष्टि की सीमाएँ स्पष्ट हो गईं।

किताब में काँग्रेस की इन सभी हरकतों का विस्तृत ब्यौरा दिया गया है। मसलन, जब बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने की कोई ज़रूरत नहीं थी, केंद्र सरकार के निर्देश पर स्थानीय प्रशासन ने अदालत को भरोसा दिलाया कि ताला खोलने से क़ानून-व्यवस्था ख़राब नहीं होगी, इसलिए ताला खोल दिया जाए।

हेमंत शर्मा को केंद्र सरकार की मिलीभगत की जानकारी काँग्रेस के नेताओं से ही मिल रही थी। उन्होंने लिखा है, "उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह ने मुझे ख़ुद बताया कि दिल्ली से सीधे आदेश आ रहे थे और कमिश्नर से सीधे कहा जा रहा था कि इस बात के सभी उपाय किए जाएं कि ताला खोलने की अर्ज़ी मंज़ूर हो।"

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हेमंत लिखते हैं, "यह धारणा ग़लत है कि राम जन्मस्थान को लेकर बीजेपी या जनसंघ ने ही लड़ाइयाँ लड़ीं या मंदिर निर्माण के लिए सिर्फ़ उनकी ही प्रतिबद्धता रही। मेरा निष्कर्ष है कि इस पूरे विवाद और आंदोलन के पीछे काँग्रेस मज़बूती से रही। काँग्रेस की नीति आज़ादी के बाद से ही मंदिर समर्थक की रही। 6 दिसंबर, 1992 के ध्वंस के लिए बीजेपी से कहीं ज़्यादा केंद्र की कांग्रेस सरकार ज़िम्मेदार है।"

किताब में दर्ज किए गए इन तथ्यों से क़तई इनकार नहीं किया जा सकता है कि जब बाबरी मस्जिद के भीतर चुपचाप और चालाकी से मूर्तियाँ रख दी गईं, उस वक़्त गोविंद बल्लभ पंत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। और उन्होंने बाद में इन मूर्तियों को हटाने की हिम्मत नहीं की।

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इमारत का ताला जब खुला तब राजीव गाँधी देश के प्रधानमंत्री थे। फिर 1989 में उनकी ही सरकार ने अयोध्या में राम मंदिर का शिलान्यास करवाया और चुनाव प्रचार अयोध्या से शुरू करते हुए रामराज्य का वादा किया। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि बाबरी मस्जिद को ढहाकर वहाँ अस्थायी मंदिर बनाने की बुनियाद ही छल के आधार पर डाली गई। छल का ये खेल उससे भी बहुत पहले से ही चला आ रहा था।

किसने किसको छला? क्या विश्व हिंदू परिषद ने प्रधानमंत्री नरसिंह राव को छला? या नरसिंह राव बाबरी मस्जिद को ध्वस्त होता देख बीजेपी को छल रहे थे? क्या आरएसएस ने कल्याण सिंह को छला जो 6 दिसंबर की सुबह इस बात पर हतप्रभ थे कि बाबरी मस्जिद तोड़े जाने की योजना उन्हें क्यों नहीं बताई गई? क्या कल्याण सिंह की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बाबरी मस्जिद को नुक़सान न पहुँचने का हलफ़नामा देकर न्यायपालिका को छला? क्या नरसिंह राव छिपे हुए हिंदुत्ववादी थे जिन्होंने कांग्रेस पार्टी को छला? क्या कारसेवकों ने अपने मातृसंगठन आरएसएस को छला और बिना किसी योजना के बाबरी मस्जिद तोड़ डाली? या फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने छल-कपट की बुनियाद पर हिंदुओं को आंदोलित किया और पूरे देश कोअपने प्रिय स्वयंसेवक लालकृष्ण आडवाणी के ज़रिए सांप्रदायिक उन्माद की आग में झोंक दिया?

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हेमंत शर्मा ने कुछ दिनों पहले ही एक समाचार पत्र में ये साफ़-साफ़ लिखा था कि मस्जिद ढहाने की साज़िश रची गई थी। पर 25 बरस बाद तमाम लोगों से बात करने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि मस्जिद तोड़ने की कोई साज़िश नहीं रची गई थी। ये अलग बात है कि लालकृष्ण आडवाणी से लेकर उमा भारती तक बीजेपी के कई नेता अब भी इस साज़िश के मुकदमे में अभियुक्त हैं और अदालत ने अभी इनमें से किसी को बरी नहीं किया है।

जब आँखों के सामने बाबरी मस्जिद ढहाई जा रही थी तो रिपोर्टर को लगा कि ये काम बिना गहरी साज़िश के नहीं हो सकता। पर ढाई दशक बाद उसी रिपोर्टर के कथित षडयंत्रकारियों के तर्क से सहमत होना एक दिलचस्प बात है।

इनमें से कोई भी व्यक्ति, संगठन या संस्था सवालों से परे नहीं हैं। हेमंत शर्मा ने सवाल विश्व हिंदू परिषद पर भी उठाए हैं पर उस तेजी के साथ नहीं जिस तेजी के साथ उन्होंने काँग्रेसी नेताओं को पर किया है।

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उन्होंने लिखा है, "कारसेवकों को वही करने के लिए बुलाया गया, जो उन्होंने किया। 'ढाँचे पर विजय पाने' और 'ग़ुलामी के प्रतीक को मिटाने' के लिए ही तो वे यहाँ लाए गए थे। दो सौ से दो हज़ार किलोमीटर दूर से जिन कारसेवकों को इस नारे के साथ यहाँ लाया गया था कि 'एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड़ दो।' उन्हें आख़िरकार यही तो करना था। वे कोई भजन कीर्तन करने नहीं आए थे। … ढाई लाख कारसेवक अयोध्या में जमा थे। नफ़रत, उन्माद और जुनून से लैस। उन्हें जो ट्रेनिंग दी गई थी या जिस हिंसक भाषा में समझाया गया था, उसके चलते अब उन्हें पीछे हटने को कैसे कहा जा सकता था?"

पर कार सेवकों को हिंसक भाषा में समझाने वाला कौन था? उनके सिर पर रक्तरंजित जुनून पैदा करने वाले कौन नेता थे? कौन थे वो लोग जो लगातार कहते रहे, बल्कि आज भी धमकाते हुए पूछते हैं, "अगर न्याय नहीं मिलेगा तो अयोध्या में महाभारत होगा। हिंसा को कौन रोक सकेगा?" किताब में इन सवालों के जवाब देने की कोशिश की गई है पर पूरी ज़िम्मेदारी फ़ैसला करने में ढीली न्यायपालिका और काँग्रेसी नेताओं की अवसरवादिता पर डाल दी गई है।

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आपको बता दें कि इस पुस्तक का लोकार्पण दिल्ली में किया गया हैं, जिसके मुख्य अतिथि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह, सरसंधचालक मोहन भागवत एवं गृहमंत्री राजनाथ सिंह थे।

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