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पूरी सच्चाई: हर भारतीय को जानना चाहिए- क्या है जम्मू-कश्मीर ?

नई दिल्ली: जम्मू-कश्मीर भारत का एक अटूट अंग है, लेकिन भारत के अन्य राज्यों के मुकाबले ‘जम्मू-कश्मीर सरकार को ज्यादा प्रिय है’, ऐस हम नहीं बल्कि जम्मू-कश्मीर को मिलने वाले विशेष प्रावधान कहते हैं। हालांकि इस बात से भी मुंह नही मोड़ा जा सकता कि इस विशेष प्रावधान को लेकर कई तरह के सवाल खड़े किए गए और इस वापस करने की मांग उठ चुकी है।

दरअसल जम्मू-कश्मीर के लिए भारत के संबंविधन में एक विशेष व्यवस्था की गई है, जिसे धारा 370 का नाम दिया गया है। इसी धार का एक भाग है धारा 35-ए, जो मौजूदा समय में एक बार फिर से राजनीतिक कारणों के कारण चर्चा में है। इस विशेष प्रावधान को हटाने के बाद क्या हो सकता है इसका अंदाजा पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला ने पहले ही लगा लिया है और उनका मानना है कि यदि इस प्रावधान को हटाया गया तो घाटी की जनता विद्रोह कर देगी।

आपको बता दें कि मौजूदा समय में ये विशेष प्रावधान हटाया नहीं गया है फिर भी आप मीडिया के माध्यम से यह समझ सकते हैं कि जम्मू-कश्मीर में किस कदर का माहौल बना हुआ है। इनमें सबसे ज्यादी पीड़ा तब होती है जब सरहद की हिफजत के लिए अपनी जान की बाजी लगाने वाले जवानों पर पथराव किया जाता है, क्या उस विशेष प्रावधान में इन लोगों को ऐसे भी अधिकार दिए गए हैं कि सेना के खिलाफ आवाज उठाओ, और आतंकियों की मदद करों।

दरअसल आज आर्टिकल35-A के लेकर कुछ समझने के कोशिश करें कि आखिर इसकी शुरुआत कहा से हुई, बताया जाता है कि आर्टिकल35-A, की मूल भावना जम्मू-कश्मीर के भारत के अंग बनने से पहले के वहां के शासक महाराज हरि सिंह द्वारा लाए गए एक कानून से लिया गया है। इसमें हरि सिंह ने जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के साथ बाहर से आने वालों के अधिकारों का जिक्र किया था।

लेकिन बाद में पाकिस्तानी कबीलों के आक्रमण के बाद हरि सिंह ने भारत में विलय की घोषणा कर दी, विलय के बाद जम्मू-कश्मीर की कमान शेख अब्दुल्ला के हाथों में आ गई, उन्होंने प्रधानमंत्री नेहरू से घाटी के लिए विशेष प्रावधानों की बात की और 370 धारा संविधान में शामिल किया गया जो जम्मू-कश्मीर को विशेष अधिकार देता है।

मीडिया रिपोर्टस के अनुसार 1952 में दोनों नेता के बीच हुए करार के बाद राष्ट्रपति के आदेश पर जम्मू कश्मीर के हित में संविधान में कुछ और प्रावधान शामिल किए गए और आर्टिकल 35-A, भी इन्ही में से एक था। 1956 में जम्मू-कश्मीर का संविधान बना, जिसमें स्थानीय नागरिकों को लेकर महाराजा हरि सिंह की परिभाषा को ही स्थान दिया गया।

इस मतलब ये हुआ कि जो व्यक्ति 14 मई 1954 को या उससे पहले 10 वर्षों से राज्य का नागरिक रहा है और उसने वहां संपत्ती हासिल की है उसे ही वहां का नागरिक माना जाएगा। ऐसे में कहीं यहां की स्थानीय लड़की किसी बाहरी आदमी से शादी कर लेती है तो उसे भी अपनी संपत्ती से हाथ धोना पड़ेगा।

इसका साफ और सीधा मतलब है कि आर्टिकल 35-A के अनुसार राज्य के बाहर से आए लोगों को यहां बसने की अनुमति नहीं है, वो यहां जमीन नहीं खरीद सकते, और सरकार द्वारा मिलने वाले लाभ को भी नहीं प्राप्त कर सकते हैं। इस धारा के लागू होने के कुछ दिनों बाद ही हटाने की मांग होने लगी थी।

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