Breaking News
  • मंदी से निपटने के लिए सरकार ने किए बड़े ऐलान, ऑटो सेक्टर को होगा उत्थान
  • तीन देशों की यात्रा के दूसरे चरण में यूएई की राजधानी आबू धाबी पहुंचे मोदी
  • देश भर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की धूम, राष्ट्रपति कोविंद और पीएम मोदी ने दी शुभकामनाएं
  • 1st Test Day-2: भारत की पहली पारी 297 रनों पर सिमटी, रवींद्र जडेजा ने बनाए 58 रन

खुदीराम बोस क्रांति के एक विशेष दूत, जिन्होंने हंसते-हंसते लगाया फांसी के फंदे को गले

सत्यम दूबे

नोएडा : आजादी के लिए क्रांतिकारियो की जो कतार दिखाई देती है, उसमें खुदीराम बोस सबसे पहले नज़र आते है। क्योंकि इतनी छोटी सी उम्र में उतना बड़ा कारनामा कर पाना हर किसी के वश की बात नहीं। इन्ही की बदौलत भारत आज गुलामी की जंजीरो से मुक्त हो पाया है । क्रांतिकारियो ने अपने प्राणो की जो आहुति दी थी, भारत उन्ही क्रांतिकारियो के प्राणों की शिलालेख पर विद्यमान है । उस वक्त किये संघर्ष में क्रातिकारी अपने जज्बातो को लेकर सामने आते थे । न उम्र की कोई सीमा, न जाती का कोई बंधन सभी एक सुर में क्रांति के गीत गाते थे। ऐसे ही एक महान क्रांतिकारी खुदीराम बोस थे, जो मात्र 19 वर्ष के उम्र में ही फांसी के फंदे पर झूल गये।

बता दें कि इनका जन्म 3 दिसंबर 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के बहुवैनी में हुआ था । ये रइस खानदान से थे । इनके पिता त्रिलोकनाथ बसु शहर में तहसीलदार थे और माता एक कुशल गृहिणी के साथ-साथ धार्मिक व्यक्तित्व की थी। खुदीराम बोस बचपन से ही धार्मिक भावनाओं पर विश्वास करते थे और उनके इस ज़िन्दगी को एक नया मोड़ देने का काम किया श्रीमद्भगवत गीता ने। जिससे प्रेरित होकर वे क्रांतिकारियों की टोली में शामिल हो गए। खुदीराम बोस के लहू का संचार इतना प्रखर था कि कक्षा 9 के बाद पढ़ाई छोड़ कर वे स्वदेशी आंदोलनो का हिस्सा बन गये । इसके बाद क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं के साथ जुगंत पार्टी में शामिल हो गये और वंदेमातरम लिखे पर्चे वितरित करने लगे । इस कार्य से लोगो में आजादी के प्रति जो नये विचार ने जन्म लिया इससे इनका हौसला और बढ़ गया ।

वक्त था 1905 का जब ब्रिटिश शासन ने बंगाल के विभाजन का ऐलान किया। जिसके बाद 28 फरवरी 1906 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया । लेकिन कहा जाता हैं न की आजादी के दीवाने के लिए ये सलाखें किसी भी तरह का व्यवधान उत्पन्न नहीं कर सकता। वे उस कैद से भाग निकले । लगभग दो महीने बाद अंग्रेजो ने दोबारा इन्हें पकड़ने में कामयाबी हासिल की । जिसके बाद 16 मई 1906 को इनको अंग्रेजो ने बोस को रिहा कर दिया । 6 दिसंबर 1907 को खुदीराम ने नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर बंगाल के गवर्नर की विशेष ट्रेन पर हमला कर दिये लेकिन गवर्नर बच गया । इसके एक साल बाद 1908 में खुदीराम ने दो अंग्रेज अधिकारियों वाट्सन और पैम्फायल्ट फुलर पर बम से हमला कर दिये लेकिन वे भी बच निकले ।

अब बारी थी मुजफ्फरपुर के सेशन जज की जिसने बंगाल के कई देश भक्तो को कड़ी सजा दी थी । उन्होंने अपने साथी प्रफुल्लचंद चाकी के साथ मिलकर किंग्सफोर्ड को सबक सिखाने की ठानी। वे और प्रफुल्ल चंद मुजफ्फरपुर आए और वक्त के सहीं नजाकत को देखकर 30 अप्रैल 1908 को सेशन जज की गाड़ी पर बम फेंक दिये । जिस गाड़ी पर उन्होने बम फेंका उस गाड़ी में सेशन जज उस वक्त नही थें। बल्कि उस गाड़ी में जज के परिचित दो यूरोपीय महिलायें  कैनेडी और उसकी बेटी सवार थीं। जज के मारने के चक्कर में दो महिलाये मारा गयी जिसका खुदीराम और प्रफुल्ल चंद चाकी को काफी अफसोस हुआ । इस घटना के बाद अंग्रेज पुलिस उनके पीछे पड़ गये। अंततः उनको वैनी रेलवे स्टेशन पर घेर लिया गया । अपने को पुलिस से घिरा देख प्रफुल्ल चंद चाकी ने खुद को गोली मार ली और खुदीराम पकड़े गये । उनपर मुकदमा चला और यह मुकदमा केवल पांच दिनों तक चला।

जिसके बाद उन्हें 8 जून को 1908 को अदालत में पेश किया गया और 13 जून 1908 को उन्हे फांसी की सजा सुनाई गयी । जब जज खुदीराम को सजा सुना रहे थे तो उनके चेहरे पर मुस्कान थी । जज ने सोचा उम्र कम होने के कारण शायद सजा की गंभीरत न मालूम हो , तो उसने खुदीराम से पूछा कि तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान क्यों है । खुदीराम ने जज से कहा यदि मुझे फांसी की सजा न सुनाई गयी होती तो मैं आपको बम बनाने की तकनीक बताता ।

11 अगस्त 1908 का वह दिन आ ही गया जब खुदीराम को फांसी देना था । जज ने खुद ही बताया कि खुदीराम एक शेर की बच्चे की तरह निडर होकर फांसी के तख्ते की ओर बढ़ रहे थे, उस वक्त भी उनको चेहरे पर मुस्कान थी और वे हंसते-हंसते फांसी के फंदे से झूल गये । इनके साहस को देखकर उस वक्त बंगाल के जुलाहे एक खास किस्म की धोती बुनने लगे जिसमें धोती के एक सिरे पर खुदीराम लिखा होता था । नौजवानो में वे इतने लोकप्रिय हुए कि नौजवान ऐसी ही धोती पहनने लगे ।

loading...