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153 क्रांतिकारियों को मौत की सजा से बचाने वाले 'महामना' की ये बातें जानकर आप भी गर्व करेंगे

नई दिल्ली: आज 25 दिसंबर का दिन भारत के इतिहास में बेहद ही खास है। आज ही के दिन साल 1861 में महामना पंडित मदन मोहन मालवीय का जन्म इलाहाबाद में हुआ था जो अब प्रयागराज के नाम से जाना जाती है। हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार एक आदेश पारिस किया जिसके बाद इलाहाबाद का नाम प्रयागराज कर दिया है।

मालवीय का जन्म भले ही इलाहाबाद में हुआ लेकिन इनके लिए सबसे खास शहर बनारस है, जहां उन्होंने 1915 में काशी (बनारस) हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की स्थापना की, वह एक महान शिक्षाविद् थे जो अपने महान कार्यों के चलते 'महामना' कहलाए। कलकत्ता यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने वाले मालवीय ने अपना करियर इलाहाबाद जिला विद्यालय में एक शिक्षक के तैर पर शुरू किया।

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एक महान शिक्षाविद् के साथ-साथ मालवीय की पहचान एक दिग्गज वकील और राजनेता के तौर पर भी की जाती है। उन्होंने साल 1893 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत की जबकि 1885 से 1907 के बीच हिन्दुस्तान, इंडियन यूनियन और अभ्युदय का संपादन भी किया। कहा जाता है कि जब मालवीय इलाहाबाद हाई कोर्ट में वकालत कर रहे थे तब उन्होंने गोरखपुर के चौरी चौरा घटना में आरोपी बनाए गए क्रांतिकारियों के लिए केस लड़ा था। इतना ही नहीं उन्होंने अपने जीवनकाल में 153 क्रांतिकारियों को मौत की सजा से बचाया था।

आपको बता दें कि देश की मैजूदा सरकार मालवीय को हिंदू राष्ट्रवादी बताने का प्रयास करती है और अपने आप को मालवीय के सबसे करीब बताने का प्रयास करती है। जबकी हकीत है कि वह हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने के लिए पहचाने जाते है। उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द पर दो प्रसिद्ध भाषण दिए जिनमें से साल 1922 में लाहौर में जबकि दूसरा भाषण 1931 में कानपुर में दिया था।

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आपको बता दें कि मालवीय भी वल्लभभाई पटेल की तरह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दिग्गज नेताओं और चेहरों में से एक थे। वह 1909, 1918, 1932 और 1933 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। दक्षिणपंथी हिंदू महासभा के प्रारंभिक नेताओं में से एक मालवीय समाज सुधारक और सफल सांसद थे।

उन्होंने भारत की आजादी की लड़ाइयों में भी बढ़-चढ़ क हिस्सा लिया लेकिन दुर्भाग्यवश उन्होंने भारत की आजादी से पहले ही दुनिया को अलविदा कर दिया। उनका निधन 12 नवंबर, 1946 को हुआ था। लेकिन इससे भी बड़ी दुर्भाग्य की बात यह है कि इतने महान कार्य करने वाले महामना के मौक के काफी साल बाद उन्हें 24 दिसंबर, 2014 को उनकी 153वीं जयंती से एक दिन पहले उन्हें भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मनित किया गया।

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