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हिंन्दुस्तान ही मेरा वतन है और मै अपने वतन के लिए आजीवन हॉकी खेलता रहूंगा, ऐसे थे ध्यानचंद

सत्यम दूबे

नोएडा : अपनी प्रतिभा से भारत का नाम रोशन करने वाला वो युवा खिलाड़ी जो भारत में ही नही जर्मनी तक में अपनी छाप छोड़ी थी । आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस खिलाड़ी की धमक देश के युवाओ के रगो में घोलना चाहते हैं । इस खिलाड़ी की छवि दुनिया को उस वक्त चौका दी थी, जब जर्मनी का तानाशाह हिटलर इस खिलाड़ी से विशेष आग्रह करके मिला था । हम बात कर रहें हैं हांकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की ।

आज जब भारत मेजर ध्यानचंद का 114वां जन्मदिवस मनाने जा रहा है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फिट इंडिया का उद्घाटन किये हैं । इसका मकसद यह है कि व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रुप से स्वस्थ्य रहे तथा बच्चो को खेलो से सीधा जोड़ा जा सके । मेजर ध्यानचंद देश के ऐसे प्रतिभावान खिलाड़ी थे , जिनके खेल को दुनिया ने सराहा । तो आज हम आपको बतायेंगे इनके जीवन और इनके खेल से संबंधित कुछ बाते ।

मेजर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त सन्‌ 1905 ई. को प्रयागराज जिले में जो तत्कालीन इलाहाबाद था, में हुआ था । ध्यानचंद बाल्य जीवन से ही बहुत धीर-गंभीर थे इसलिए इनके बाल्य जीवन में खिलाड़ी का कोई गुण नही दिखाई देता था । कहते है न कि जब किस्मत में कुछ और हो तो उस दिशा में आदमी खींचा चला जाता है । यही  मेजर ध्यानचंद के साथ हुआ । साधारण शिक्षा प्राप्त करने के बाद 16 वर्ष की उम्र में सन 1922 ई में मेजर ध्यानचंद दिल्ली आये । और यहां आकर वो प्रथम ब्राह्मण रेजीमेंट में सेना में एक सिपाही के पद पर नौकरी करने लगे । इस वक्त भी उनके मन में हॉकी को लेकर कोई रुचि नहीं थी । हॉकी के प्रति इनको जागरुक करने का श्रेय रेजीमेंट के ही एक सूबेदार मेजर तिवारी को जाता है, जिन्होने इनको हांकी के प्रति उकसाया इतना ही नहीं मेजर तिवारी की देख-रेख में ध्यानचंद हांकी खेलने लगे । इसी बीच 1927 ई में ध्यानचंद को लांस नायक बना दिया गया ।

सर 1932 ई में इनको लॉस ऐंजल्स भेजा गया वहां इन्होने नायक की भूमिका निभाई । इसके पांच साल बाद 1937 ई में जब ये भारतीय हांकी दल के कप्तान थे तो एक बार फिर सेना में इनका प्रमोशन हुआ और सूबेदार बना दिया गया । इसके बाद हॉकी में जुनून इतना बढ़ा कि ये रात को दिन और दिन को रात समझ कर अभ्यास करने लगे । जब ये रात को अभ्यास करते थे उस वक्त केवल चंद्रमा की ही रोशनी होती थी । चंद्रमा की रोशनी में अभ्यास करते -करते ये इतने मशहूर हो गये कि इनके साथियो ने इनका नाम ध्यान सिंह के बजाय ध्यानचंद कर दिया । सन 1928 में एम्सटर्डम में हुए ओलिंपिक खेल में मेजर ध्यानचंद भारत की तरफ से सबसे ज्यादा गोल करने वाले खिलाड़ी बनें उस टूर्नामेंट में ध्यानचंद अकेले 14 गोल दागे थे । अगले दिन एक स्थानीय समाचार पत्र ने लिखा कि 'यह हॉकी नहीं बल्कि जादू था। और ध्यानचंद को हॉकी के जादूगर के रुप में प्रदर्शित किया था । तभी से इनका नाम हांकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद हो गया ।

हॉकी एक ऐसा खेल है जिसमें दिमाग चतुराई और स्फुर्ति तीनो की जरुरत एक साथ पड़ती है । ध्यानचंद इन तीनो का इस्तेमाल एक साथ करने वाले प्रतिभाशाली खिलाड़ी थे । हॉकी के मैदान को ध्यानचंद इस तरीके से देखते थे जैसे कोई शतरंज का खिलाड़ी चेस बोर्ड को देखता है । उनको बिना देखे पता होता था, मैदान के किस हिस्से में उनकी टीम के खिलाड़ी और प्रतिद्वंदी मूव कर रहे हैं । सन् 1935 में टीम ऑस्ट्रेलिया गयी थी और एडिलेड में मैच हो रहा था उस मैच में ऑस्ट्रेलिया के महान क्रिकेटर सर डोनाल्ड ब्रैडमैन हाकी का मैच देखने आये थे । मैच समाप्त होने के बाद डोनाल्ड ब्रैडमैन से पूछा गया कि मैच कैसे रहा तब उन्होने ने कहा था कि ध्यानचंद ऐसे गोल करते हैं जैसे क्रिकेट में रन बनता है।  

सन 1936 में वर्लिन ओलंपिक में टीम हिस्सा लेने गयी थी । जिसमें टीम का एक मुकाबला जर्मनी से था । उस मैच को देखने वहां का तानाशाह हिटलर आया था । ध्यानचंद के गोल करने के तरीके से वो इतना प्रभावित हुआ कि उसने ध्यानचंद को जर्मनी की फौज में बड़े पद का लालच दिया और जर्मनी की तरफ से हांकी खेलने का आग्रह किया । इसपर हिटलर को कड़े शब्दो में जवाब देते हुए बोले कि हिंन्दुस्तान ही मेरा वतन है और मै अपने वतन के लिए आजीवन हांकी खेलता रहूंगा । इसके बाद सन 1947 में पूर्वी अफ्रिका में टीम गयी थी । उस दौरान एक मैच में ध्यानचंद ने केडी सिंह बाबू को गेंद पास करने के बाद अपने ही गोल की तरफ़ से अपना मुंह मोड़ लिया और बाबू की तरफ़ देखा तक नहीं । जब मैच समाप्त हो गया तो उनसे इस घटना के बारे नें पूछा गया तब उन्होने कहा था कि अगर उस पास पर भी बाबू गोल नहीं मार पाते तो उन्हें मेरी टीम में रहने का कोई हक़ नहीं था । अपने 22 साल के हांकी कैरियर में उन्होने दुनिया के हैरान कर दिया था । इस दौरान अपने पुरे कैरियर में ध्यानचंद 400 गोल दागे थे इतना ही नहीं इनको 1928,1932और 1936 में ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किये थे । तीनो बार भारत ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीता था ।

भारत सरकार ने सन 2002 में ध्यानचंद के नाम से ही खेल का सर्वोच्च पुरस्कार देने का फैसला किया ।  और वियना में ध्यानचंद की एक विशेष मूर्ति लगाई गई है. इसमें 4 हाथ हैं. चारों में हॉकी स्टिक है. ऐसा उनकी महानता दिखाने के लिए किया गया है ।

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