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जानकारों की राय: येदियुरप्पा को सीएम बनाकर मुसीबत में फंसे राज्यपाल?

नई दिल्ली: कर्नाटक पर छिड़ा घमासान जितना राजनीति है उससे कहीं ज्यादा संवैधानिक मामला है। इस पूरे प्रकरण में राज्यपाल की बड़ी भूमिका है। जिसके कारण आज यह स्थित बन आई है। वैसे राज्यपाल ने सिर्फ अपना अधिकार ही प्रयोग की था, लेकिन मामला उलट हो गये। इस मामले को लेकर जानकारों की क्या राय है आप भी जानिए...

राज्यपाल संवैधानिक और कार्यपालिका का प्रमुख होता है, जो मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार कार्य करता है। राज्यपाल को कुछ विवेकाधिकार भी होते हैं, ऐसे मामले में वह मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना भी कार्य करता है। कर्नाटक को लेकर जारी घमासान पर राज्यपाल को भी आड़े हाथ लिया जा रहा है। ऐसे में जानकारों का कहना है कि राज्यपाल ने यहाँ सिर्फ आर्टिकल 164 (1) का ही पालन किया है। जिसमें वह त्रिशंकु विधानसभा होने पर भी किसी को भी सीएम बना सकते है। लेकिन आखिर यहाँ मामला उलटा कैसे हो गया यह गौर करने वाली बात है। आर्टिकल 164(1) में त्रिशंकु विधानसभा होने पर किसी को सीएम या मंत्रिमंडल का गठन किया जा सकता है लेकिन इसी में आर्टिकल 164(2) में यह भी लिखा है कि, गवर्नर द्वारा मंत्री चुने जाने में 'कलेक्टिव असेंबली' का योगदान होना चाहिए।

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'कलेक्टिव असेंबली' का मतलब है सीएम या मंत्री को सदन का बहुमत हासिल हो, बहुमत से गठबंधन का हो या फिर बाहर से। आम तौर पर जब कोई नेता राज्यपाल के पास सरकार बनाने का प्रस्ताव लेकर जाता है तो राज्यपाल उसके सदस्यों और या विधायकों की संख्या को देखते हैं जिसके आधार पर ही वह आगे कोई फैसला लेते हैं। कई बार त्रिशंकु विधानसभा होने पर राज्यपाल की सूझबूझ की परीक्षा होती है। जब राज्य में किसी को भी बहुमत न हासिल हो और सभी सरकार बनाने का दावा करें। ऐसे में राज्यपाल को निर्णय लेने के लिए देखना होता है कि कौन विधानसभा में बहुमत साबित सकता है। यहाँ यह नहीं सोचा जा सकता है कि त्रिशंकु विधानसभा में बहुमत नहीं साबित हो पाएगा। या सभी अलग ही रहेंगे, सरकार बनने के लिए कोई दो दल गठबंधन भी कर सकते हैं। ऐसे में देखा जाता है कि किसके पास विधानसभा में बहुमत जुटाने की क्षमता है। उसी आधार पर राज्यपाल सरकार बनाने के लिए न्यौता देता है।

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यहाँ एक बात और है कि राज्यपाल को ही यह सुनिश्चित करना होता है कि कोई भी पार्टी बहुमत साबित कर सकती है या नहीं। फिर चाहे इसके लिए किसी पार्टी के साथ गठबंधन ही क्यों न हो। यह सभी पर लागू होता है, फिर चाहे वो अकेली सबसे बड़ी पार्टी या दूसरे नंबर की बड़ी पार्टी।  लेकिन कर्नाटक में राज्यपाल वजुभाई वाला ने उलटा किया है। विधानसभा त्रिशंकु हो गयी और उन्होंने बड़ी पार्टी को सरकार बनवा दी। यहाँ उस बात को नजरंदाज किया गया कि यह दूसरी बड़ी पार्टी भी किसी के साथ गठबंधन कर बहुमत का आंकड़ा पेश कर सकती हैं, जैसा कि कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर ने किया।

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संविधान के आर्टिकल 164 में साफ़ कहा गया हुई कि, जब भी किसी पार्टी को सरकार बनाने का निमंत्रण मिले, वो बहुमत साबित कर पाए। लेकिन कर्नाटक में पहले सरकार बन गयी बाद में बहुमत साबित करने की पहल हो रही है। संवैधानिक जानकारों का कहना है कि संविधान को बदला या तोड़ा-मरोड़ा नहीं जा सकता। बड़ी पार्टी को सरकार के लिए बुलाया जा सकता है, लेकिन बहुमत वाले गठबंधन को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है।

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