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SC/ST एक्ट पर कोर्ट की गंभीर टिप्पणी: कहा जीने के अधिकार को नहीं छीना जा सकता?

नई दिल्ली: एससी एसटी एक्ट को लेकर केंद्र सरकार अध्यादेश लाने वाली है जिससे सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को निष्प्रभाव किया जा सके। मामला दर्ज होने के बाद बिना जाँच के ही किसी की तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगाई गयी थी। वहीं अब कोर्ट ने एकबार फिर से इस मामले पर गंभीर टिप्पणी की है।

बतादें कि एससी एसटी एक्ट का भारत में सबसे ज्यादा दुरुपयोग हो रहा है। मामले में झूठे मुकदमे लिखवाकर लोगों की जिंदगियां बर्बाद कर दी जा रही हैं। ऐसे में इस समाज विरोधी कानून में सुप्रीम कोर्ट ने ज़रा सा संसोधन करते हुए मामला दर्ज होने के बाद बिना जाँच के ही होने वाली गिरफ़्तारी पर रोक लगा दी थी। जिसके बाद 2 अप्रैल को दलित संगठनों ने पूरे देश में आतंक मचाया था। वहीँ नरेंद्र मोदी सरकार अपने राजनीति हित साधने के लिए इस पर अध्यादेश ला रही है। जिसको लेकर कोर्ट ने एकबार फिर से टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि, प्रत्येक कानून को जीवन के अधिकार से संबंधित मौलिक अधिकार के दायरे में देखना होगा।

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कोर्ट ने कहा कि जीने के अधिकार को संसद भी कम नहीं कर सकती। जस्टिस गोयल की बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा कि, जो भी कानून है, उसे अनुच्छेद-21 (जीवन के अधिकार) के दायरे में देखना होगा। कोर्ट ने कहा कि कोई भी कानून जीने के अधिकार को नहीं छीन सकता है या कम भी नहीं किया जा सकता है। यहां तक कि कानून बनाने वाली संसद भी इस अधिकार को खत्म नहीं कर सकती।

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कोर्ट ने एससी एसटी मामले में होने वाली गिरफ्तारी पर कहा कि, किसी की गिरफ्तारी बिना किसी निष्पक्ष प्रक्रिया के कैसे हो सकती है? इसे अनुच्छेद-21 के संदर्भ में अनिवार्य तौर पर देखना होगा। अगर बिना निष्पक्ष प्रक्रिया के गिरफ्तारी होती है तो हम सभ्य समाज में नहीं रह रहे हैं। वहीँ इस मामले में कोर्ट ने फिर से अपने आदेश में कोई बदलाव नहीं किया है। साथ ही गंभीर टिप्पणी करते हुए केंद्र को आगाह भी किया है कि कोई कानून जीने के अधिकार को नहीं छीन सकता है।

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