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ऐतिहासिक चातुमार्स के महाप्रवेश की महागाथा

RAJASTHAN:- राष्ट्रसंत श्री जयंतसेनसूरीश्वरजी महाराजा के शिष्य श्रुतप्रभावक मुनीराजश्री वैभवरत्न विजयजी म.सा. राजस्थान राज्य में अपने प्रथम चातुर्मास के अंतर्गत आहोर नगर में उत्तम शासनरक्षा के अध्याय रच रहे है। इतिहास की साक्षी है कि, शासनप्रभावना और शासनसेवा के साथ साथ शासनरक्षा की आवश्यकता भी रहती ही है। इसी विचार को वास्तविक बनाने हेतु मुनीवर प्रतिदिन शासनरक्षा हेतु कटिबद्ध है। श्री जयंतसेन सूरीश्वरजी महाराजा की छत्रछाया और श्री चंद्रशेखर विजयजी महाराजा के संस्कार जिनको प्राप्त हुए है ऐसे मुनीवर के प्रवचन की असर एक फिर से पायी गई है।

कुछ दिन पहले ही आहोर की गर्ल्स हॉस्टल की विद्यार्थियों के लिए श्री आहोर जैन संघ ने मुनीवर के प्रवचन का प्रबंध किया था। जहाँ 400 विद्यार्थियों को मुनीवर ने स्वरक्षा और राष्ट्ररक्षा की बाते कही थी। इन्ही प्रवचनों का इतना गहरा असर हुआ की आज फिर से आहोर के शासकीय विद्यालय में मुनीवर के प्रवचन का आयोजन रखा गया। जहां करीब 1000 विद्यार्थीओ को मुनीवर ने प्रवचन दिए।

करीब एक घंटे के प्रवचन में मुनीवर ने देश का सुनहरा भविष्य जो है उन बच्चो को राष्ट्र रक्षा की बात कही। देश का आज़ादी दिन करीब है जिसके उपलक्ष्य में यह विशेष प्रवचन रखे गए थे। मुनीवर ने बच्चो को कहा की, 1947 तक अंग्रेजो ने भारत देश में रक्तपात किया तब हमारे महापुरुषों ने उत्तम बहादुरी का विकास करते हुए इस देश को रक्तपात से आज़ाद किया। विशाल सुनहरे भारत का सपना देखते हुए कई वीर सपूत शहीद हो गए। लेकिन आज भी एक रक्तपात जारी है और वह है 'संस्कृति का रक्तपत्त'

द्रौपदी का वस्त्राहरण हुआ वह एक अन्याय था और आज माँ भारती का - पवित्र आर्यसंस्कृति का वस्त्राहरण हो रहा है वह भी तो एक अन्याय है और हम मुग्ध बनकर इस संस्कृति का अपमान होते हुए देख रहे है। अन्याय सहन करना भी अन्याय करने जितना गुनाहीत कार्य ही है। अन्याय के सामने आवाज उठाना गलत नहीं है, अधिकार है। यह सत्व दिखाने से नैसर्गिक स्वरुप से बल प्राप्त होता है। अन्याय के सामने झुकना नहीं, यही तो विद्यालय की श्रेष्ठ शिक्षा होती है।

महाभारत हुआ मर्यादा को ठेस पहुँचाने से। अगर आज हम संस्कृति को ठेस पहुंचा रहे है तो सोचनेवाली बात है की कैसा भयंकर माहौल पैदा हो सकता है। संस्कृति की रक्षा का सबसे बड़ा उपाय है स्वदेश के प्रति भक्ति रखना और स्वदेश की उत्तम रचना तब होगी जब स्वदेशी वस्तुओ का भी उपयोग हो।

मुनीवर ने विशाल सभा को कहा है की, हम सब को पता है दैनिक चीन की तरफ से हमारे जवानो - सैनिको को तकलीफे दी जाती है। हमारे बहादुर सिपाही जान की परवाह किये बिना सरहद पर लड़ रहे है सिर्फ हमारे लिए। ऐसे संजोग में हम चीनी वस्तुओ को खरीदकर उस देश में और पैसा दे रहे है ताकि वो दुगुने जोर से हम पर हमला कर सके। यह कैसा न्याय ? चीनी वस्तुओ का बहिष्कार अवश्य करना चाहिए। क्योकि राष्ट्र रक्षा सर्वोपरि है। इस देश की रक्षा होगी तभी तो संस्कृति की रक्षा होगी यह सुनहरा वाक्य मुनीवर ने बच्चो को दिया है।

मुनीवर ने विशेष प्रेरणा दी है की संस्कृति का रक्तपात नहीं होना चाहिए इसलिए आज से अभी से जागृत होना जरुरी है। अभी से कार्य शुरू करेंगे तब कुछ वर्षो में इसका परिणाम दिखेगा। संस्कृति के रक्तपात से आस्था ख़त्म हो जाती है इस आस्था को बचाना हमारा परम कर्तव्य है। अंतिम साँस तक राष्ट्र के हित का लक्ष्य बना रहना चाहिए यही बात मुनीवर ने बताई है।

REPORT BY- PRANAVSINH VAGHELA

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