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बाजार में 20 तो मंडी में 50 पैसे की दर से बिक रहा प्याज, सरकार बेपरवाह

भोपाल : प्याज की कीमत जहां दिल्ली समेत अधिकतर राज्यों में 20 रूपये प्रति किलो हैं, वहीं किसान इसे 50 पैसे की दर से बेचने को मजबूर हैं। किसानों के साथ यह भद्दा मजाक वे थोक व्यापारी कर रहें हैं जो मंडी से खरीद कर प्याज को एक जगह से दूसरे जगह तक पहुंचाते हैं। महाराष्ट्र मंडी में एक किसान को 750 किलो प्याज के बदले 1054 रूपये का भुगतान किया गया। जिसके बाद उस किसान विरोध दर्ज कराते हुए उस रूपये को प्रधानमंत्री आपदो कोष में दान कर दिया। जह इस घटना की जानकारी पीएमओ को मिली तो उन्होंने तुरंत संज्ञान लेते हुए महाराष्ट्र सरकार को तलब किया। फड़णवीस सरकार को तलब करने के बाद किसानों को उचित मुआवजा मिला या नहीं इसकी कोई जानकारी नहीं हैं, लेकिन आज भी किसानों के साथ वहीं मजाक दोहराया जा रहा हैं। जो उस किसान यानी महाराष्ट्र के नासिक के निफाड़ तहसील के संजय राठे के साथ किया गया था।  

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किसानों का कहना है कि प्याज की खेती में प्रति बीघा करीब 25 से 30 हजार का खर्चा आता है। फिलहाल जिस कीमत पर प्याज बिक रहे हैं उसे देख कर ऐसा लगता है कि हमारी मजदूरी भी वापस नहीं आएगी। मंदसौर कृषि मंडी में कई किसान मिले जिनके प्याज 50 रुपए क्विंटल तो किसी के 70 रुपए क्विंटल के भाव से बिके हैं। सबूत के तौर पर किसानों ने मंडी की पर्ची भी दिखाई। यहां आने वाले प्याज किसानों की हालत बुरी है मंडी में प्याज लाने के पहले प्याज किसान तीन चार दिनों तक मंडी के बाहर खड़े होते हैं जिसके बाद उनका नंबर आता है और वह मंडी में घुस पाते हैं। तीन चार दिन बाहर पड़े रहने पर करीब 2000 रूपये खर्च हो जाता है और ट्रैक्टर का भाड़ा भी लगता रहता है।

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प्याज की कम कीमत मिलने के कारण किसानों को उनका लागत मूल्य भी नहीं निकल पा रहा है। प्याज की सही कीमत न मिलने से किसानों में काफी नाराजगी दिख रही है। किसानों का कहना है कि जो प्याज हम लोगों से 50 पैसे प्रति किलो खरीदा जा रहा है वही प्याज बाजार में 6 से 8 रुपए प्रति किलो भी बिक रहा है। आपको बता दें कि कुछ दिनों पहले ही किसानों ने अपने ऊपज के वाजिब हक के लिए एक रैली निकाली थी, लेकिन सरकार तक अपने आवाज पहुंचाने के बाद भी उनसे ऐसा व्यवहार किया जाता हैं जैसे वो कोई गैर हैं या सरकार का उनसे कोई लेना-देना नहीं हैं। लगातार किसानों में बढ़ती आत्महत्य़ा या असंतोष के पीछे का कारण कहीं न कहीं सरकार का ये रवैया भी हैं जिसमें किसानों के प्रति उनकी लापरवाही साफ झलकती हैं।

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