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फर्जी एनकाउंटर वाले पुलिस की खैर नहीं- 7 पुलिसवाले दोषी करार

नई दिल्ली: किसी भी प्रदेश को अपराध से मुक्ति दिलाने के लिए पुलिस बड़े से बड़ा कदम उठाती है, लेकिन पुलिस की तमाम प्रयाशों के बाद भी अपराध का सिलसिला जारी है। कानून क हिसाब से पुलिस पहले अपराधियों को पकड़ने का प्रयास करती है, और जो अपराधी पुलिस को चकमा देकर भागना चाहते है उन्हें पुलिस जान से भी मार सकती है, जिसे आम भाषा में एनकाउंटर कहते हैं।

लेकिन ऐसे कई मामले भी समने आ चुके हैं, जिनमें पुलिस वाले अपने कंधों पर तमगे चमकाने मात्र के लिए किसी निर्दोष की हत्या कर देते हैं, और से इनामी बदमाश करार दे देती है।ऐसा ही एक मामला हाल ही में उत्तर प्रदेश को नोएडा में देखने को मिला,जहां पुलिस वालों पर आरोप लगा कि प्रमोशन के लिए एनकाउंटर किया है।

हालांकि ऐसा नहीं है कि फर्जी एनकाउंटर का ये कोई पहला मामला है, इससे पहले उत्तरखंड में भी 3 जुलाई, 2009 को एक फर्जी एनकाउंटर को अंजाम दिया गया था। इस दौरान पुलिस वालों ने एमबीए छात्र रणवीर सिंह का एनकाउंटर किया था। मामले में पिछले काफी दिनों तक चली जांच के बाद उत्तराखंड के 8 पुलिसकर्मियों को मंगलवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने दोषी करार दिया है जबकि इसी मामले में 11 पुलिस कर्मियों को बरी कर दिया गया है।

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इस मामले में कुल 18 पुलिसकर्मियों ने दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट की सजा के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर करते हुए अपील की थी, जिसके बाद कोर्ट का यह बड़ा फैसला आया है। दोषी करार दिए गए पुलिसकर्मियों के लिए सजा का ऐलान मामले की अगली सुनवाई में की जाएगी।

आपको बता दें कि मामले में दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने साल 2014 में 17 पुलिसकर्मियों को हत्या, अपहरण, सुबूत मिटाने और आपराधिक साजिश रचने और अंजाम तक पहुंचाने के मामले में दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जबकि एक आरोपी जसपाल सिंह को बरी किया था। लेकिन गोसांई को आइपीसी की धारा 218 के तहत सरकारी रिकार्ड को गलत तरीके से तैयार करने के मामले में दोषी करार देते हुए 50 हजार का मुचलका भरने का निर्देश भी दिया था।

ऐसे हुआ था एनकाउंटर

आपको बता दें यह मामला साल 2009 का है, जब दो जुलाई को उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के शालीमार गार्डन के रहने वाले एमबीए छात्र रणवीर सिंह अपने एक साथी रामकुमार के साथ घूमने और नौकरी के लिए इंटरव्यू देने के इरादे से देहरादून गया था। इसी दौरान 3 जुलाई को किसी बात पर उसकी कहासुनी उत्तराखंड पुलिस के कुछ अधिकारियों से हुई और फिर पुलिस ने उसे बदमाश करार देते हुए डालनवाला थाना क्षेत्र के लाडपुर के जंगल में ले जाकर फर्जी एनकाउंटर में मार गिराया था।

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मृत्क रणवीर के पिता ने इस एनकाउंटर को फर्जी करार देते हुए जांच की मांग की, लेकिन उत्तराखंड सरकार ने इससे मना करते हुए एनकाउंटर में शामिल पुलिसकर्मियों को स्मामनित भी किया। हालांकि मामले में बढ़ते विवादों और दो राज्य के बीच जुड़े मामले को देखते हुए उस समय की केंद्र सरकार ने मामले में CBI जांच के आदेश दिए थे।

सीबीआइ की जांच में खुलासा हुआ कि उत्तराखंड पुलिस ने अपनी भड़ास निकालने के लिए रणवीर का फर्जी एनकाउंटर किया था। रणवीर के शरीर पर 29 गोलियों के निशान पाए गए थे। इनमें से 17 गोलियां बेहद करीब से मारी गई थीं। जांच के दौरान सीबीआई ने 18 पुलिसकर्मी आरोपी बनाया और फिर आरोपियों के खिलाफ केस चलता रहा, जिसके इतने दिनों बाद आज कोर्ट का अहम फैसला सामने आया है।

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कोर्ट का यह फैसला उन पुलिसकर्मियों के लिए एक बड़ा सबक है, जो सरकारी वर्दी को अपनी जागीर समझते है और महज चंद मतलब के लिए किसी निर्दोष की जान लेने से भी बाज नही आते।

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