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SBI ने की MCLR में10 बेसिस प्वाइंट्स की कटौती की घोषणा, ब्याज में इतने प्रतिशत की कमी...

नोएडा : एक तरफ जहां पूरे देश में मंदी को लेकर हाहाकर मचा हुआ है, वहीं दूसरी तरफ एसबीआई ने एक ऐसी घोषणा की है जो इस मंदी की दौर में राहत भरी खबर है। दरअसल बात यह है कि SBI ने अपने MCLR में 10 बेसिस प्वाइंट्स कटौती की घोषणा की है। जिससे अब यह रेट 8.25 से घटकर 8.15 फीसदी हो जाएगी। यानी एमसीएलआर के रेट कम होने से होम लोन की ब्याज दरें कम हो जाएंगी। बता दें कि यह दरें 10 सितंबर से लागू होगी।

आपको बता दें कि यह वित्तीय साल 2019-20 का पांचवा मौका है जब एसबीआई ने ब्याज दरों में कटौती की है। इसके साथ ही बैंक ने फिक्स डिपॉजिट पर भी कटौती की घोषणा की है। अगर हम रिटेल डिपॉजिट की बात करें तो, रिटेल डिपॉजिट के दरों में भी 0.25 फीसदी की कटौती और टर्म डिपॉजिट रेट पर 0.10 से 0.20 फीसदी की कटौती की है।

 

बैंक ने कहा है कि एक साल के लिये कर्ज की सीमांत लागत आधारित (एमसीएलआर) ब्याज दर ताजा कटौती के बाद घटकर 8.15 प्रतिशत रह जायेगी। बैंक की ज्यादातर ब्याज दरें इसी दर से जुड़ी रहतीं हैं। इससे पहले यह दर 8.25 प्रतिशत रही है। इसके साथ ही बैंक ने अपनी खुदरा सावधि जमा पर भी ब्याज दर में 0.20 से 0.25 प्रतिशत तक की कटौती की है। जबकि एकमुश्त बड़ी राशि की सावधि जमा की ब्याज दर में 0.10 से लेकर 0.20 प्रतिशत तक की कटौती की है। जमा दर पर ये कटौतियां भी मंगलवार से लागू होंगी। बैंक ने कहा है कि घटती ब्याज दरों के मौजूदा परिवेश और उसके पास उपलब्ध अधिशेष नकदी को देखते हुये सावधि जमा की ब्याज दरों को परिस्थिति के अनुरूप किया गया है।

एमसीएलआर क्या है  

यह एक नई उधार दर है, जिस पर लोगों को ऋण दिया जाता हैं। इसके चार कॉम्पोनेंट्स हैं: -मार्जिनल कॉस्ट ऑफ फंड (एमसीएफ): नए लोन बैलेंस पर जो ब्याज दर होती है, उसे एमसीएफ कहा जाता है। बैंकों के लिए अपने नेट वर्थ पर यह उधार लेने और चुकाने की सीमांत लागत है। CRR : सीआरआर वह राशि है, जो बैंकों को आरबीआई के पास रखनी पड़ती है। ऐसे फंड्स की लागत को निष्क्रिय रखा जाता है और लोगों को दिए गए ऋण से वसूला जाता है। अवधि प्रीमियम: यह वह अमाउंट होता है जो लोन की अवधि के साथ बढ़ता जाता है। ऑपरेटिंग कॉस्ट: यह लोन प्रॉडक्ट्स मुहैया कराने की लागत होती है, जिसमें फंड जुटाने और बैंकिंग बिजनेस को संचालित करने की कीमत भी शामिल होती है।

आपको बता दें कि पहले बैंक ऋण का निर्धारण बेस रेट के जरिए करता था, जो आरबीआई द्वारा जारी रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट पर निर्भर रहता था। लेकिन अब इस रेट के निर्धारण का अधिकार आरबीआई ने बैंकों को दे दिया है, जिससे वे अपने अनुसार लोन के इंटरेस्ट का निर्धारण कर सकें।   

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