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महर्षि बनने से पहले डाकू रत्नाकर थे वाल्मीकि, जाने क्यों मनाई जाती है इनकी जयंती...

नई दिल्ली: देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अन्य नेताओं ने आज गुरुवार को रामायण के रचयिता के रूप में विख्यात ऋषि वाल्मीकि जयंती पर देशवासियों को बधाई दी है। आपमें से बहुत से लोग ऐसे होंगे जो ये भी जानते होंगे कि महर्षि वाल्मीकि संस्कृत के महान कवि के तौर पर भी जाने जाते हैं।

आपको बता दें कि ऋषि वाल्मीकि महाकाव्य रामायण के रचयिता के रूप में पूरी दुनिया में विख्यात हैं। उनके द्वारा लिखी गई रामायण में 24,000 श्लोक और उत्तर कांड समेत कुल सात कांड हैं। ऐसे में आज आपको वाल्मीकि जयंती से जुड़ी कुछ खास बाते बताने जा रहे हैं।

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बता दें कि अश्विन मास की शरद पूर्णिमा को महर्षि वाल्मीकि का जन्मदिवस “वाल्मीकि जयंती” के तौर पर मनाया जाता है। इस साल वाल्मीकि जयंती अंग्रेजी महीनों के हिसाब से पांच अक्टूबर को मनाया जा रहा है। वैदिक काल के प्रसिद्ध महर्षि वाल्मीकि ‘रामायण’ महाकाव्य के रचयिता के रूप में विश्व विख्यात है।

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महर्षि वाल्मीकि को न केवल संस्कृत बल्कि समस्त भाषाओं के महानतम कवियों में शुमार किया जाता है। महर्षि वाल्मीकि के जन्म के बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं है। लेकिन पौराणिक मान्यता के अनुसार उनका जन्म महर्षि कश्यप और अदिति के नौवें पुत्र वरुण और उनकी पत्नी चर्षणी के घर में हुआ।

ऐसा माना जाता है कि महर्षि भृगु वाल्मीकि के भाई थे। महर्षि वाल्मीकि का नाम उनके कड़े तप के कारण पड़ा था। एक समय ध्यान में मग्न वाल्मीकि के शरीर के चारों ओर दीमकों ने अपना घर बना लिया। जब वाल्मीकि जी की साधना पूरी हुई तो वो दीमकों के घर से बाहर निकले। दीमकों के घर को वाल्मीकि कहा जाता हैं इसलिए ही महर्षि भी वाल्मीकि के नाम से जाने गए।

पूरे देश में वाल्मीकि जयंती श्रद्धा-भक्ति एवं हर्षोल्लास के सथ मनाया जाता है। वाल्मीकि मंदिरों में श्रद्धालु आकर उनकी पूजा करते हैं। इस शुभावसर पर उनकी शोभा यात्रा भी निकली जाती हैं, जिनमें झांकियों के साथ भक्त उनकी भक्ति में नाचते, गाते और झूमते हुए आगे बढ़ते हैं।

इस अवसर पर ना केवल महर्षि वाल्मीकि बल्कि श्रीराम के भी भजन गाए जाते हैं। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण महाकाव्य के सहारे प्रेम, तप, त्याग इत्यादि दर्शाते हुए हर मनुष्य को सदभावना के पथ पर चलने के लिए प्रेरित किया। इसलिए उनका ये दिन एक पर्व के रुप में मनाया जाता है।

एक पौराणिक कथा के अनुसार वाल्मीकि महर्षि बनने से पूर्व उनका नाम रत्नाकर था। रत्नाकर अपने परिवार के पालन के लिए लूटपाट किया करते थे। एक समय उनकी मुलाकात नारद मुनि से हुई। रत्नाकर ने उन्हें भी लूटने का प्रयास किया तो नारद मुनि ने उनसे पूछा कि आप ये काम क्यों करते हैं।

नारद मुनि के सावाल का जवाब देते हुए रत्नाकर ने कहा कि परिवार के पालन-पोषण के लिए वह ऐसा करते हैं। नारद मुनि ने रत्नाकर से कहा कि जिस परिवार के लिए अपराध कर रहे है और क्या वो उनके पापों का फल भोगने मे उनकी साझीदार होगा?  इसके बाद असमंजस में पड़े रत्नाकर नारद मुनि को एक पेड़ से बांधकर अपने घर उस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए पहुंचे।

तब उन्हें बहुत ही निराशा हुई कि उनके परिवार का एक भी सदस्य उनके इस पाप का फल भोगने में साझीदार बनने को तैयार नहीं था। वाल्मीकि वापस लौटकर नारद के चरणों में गिर पड़े और उनसे ज्ञान देने के लिए कहा। नारद मुनि ने उन्हें राम नाम जपने की सलाह दी। यही रत्नाकर आगे चलकर महर्षि वाल्मीकि के रूप में विख्यात हुए।

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