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मीरा बाई को भगवान श्री कृष्ण से कैसे हुआ था प्रेम- पढ़िए रोचक बातें

भगवान श्री कृष्ण और उनके कई सारे भक्तों के बारे में आपने सुना होगा, लेकिन उन सभी भक्तों में से एक थी मीरा बाई, जो भगवान श्री कृष्ण के परम भक्त थी, कहा जाता है कि वह भगवान श्री कृष्ण की भक्ती में लीन रहती थी, जिसे आम भाषा में पागलपन भी कहा जाता है। ऐसे में आज आपके सामने मीरा बाई से संबंधित कुछ तथ्यों को रखने जा रहे है।

सबसे पहले जानते हैं मीरा बाई कौन थीं

भगवान श्री कृष्ण की अनन्य भक्त मीरा का जन्म 1498 में हुआ था, इनके पिता मेड़ता के राजा थे, कहा जाता है कि  जब मीरा बाई को बचपन में उनकी माता ने कहा था कि श्री कृष्ण जी तुमहारे दूल्हा हैं। अपनी मां की इस बात को मीरा सच मान बैठी, और इन बातों को उन पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि वह श्री कृष्ण जी को ही अपना सब कुछ मान बैठी।

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यहां तक की जब वह जवान हुई तब भी श्री कृष्ण के लिए उन मन में प्यार कम नहीं हुआ। अन्य लड़कियों की तरह वह भी अपने पति श्री कृष्ण को लेकर कई तरह के सपने सजाया करती थीं। समय के साथ-साथ मीरा का श्री कृष्ण से प्यार और भी गहरा होता चला गया।

इस बीच 1516 ई० में मीरा का विवाह मेवाड़ के राजकुमार भोजराज से तय कर दिया गया। जो मीरा के प्रति स्नेह का भाव रखते थे लेकिन मीरा ने अपना तन-मन पहले ही कृष्ण के प्यार में कुरबान कर दिया था। विवाह के बाद भी वह श्री कृष्ण की आराधना में लगी रहती थीं। वह कृष्ण को ही अपना पति समझती और वैरागिनो की तरह उनके भजन करती रहती।

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लेकिन मेवाड़ के राजवंश को पसंद नहीं था कि उनकी रानी वैरागिनी की तरह जीवन बिताए, इस लिए अब ये लोग मीरा को मरने की साजिश रचने लगे। लेकिन मीरा की सच्ची भक्ति और निश्छल प्रेम की भावना के आगे विष भी अमृत बन गया। एक शब्दों में कहे तो मीरा ने अपना पूरा जीवन कृष्ण की यादों को समर्पित कर दिया।

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मीरा ने गुरु के संबंध में माना की बिना गुरु धारण किए भक्ति संभव नहीं है। उनका मानना था कि भक्तिपूर्ण व्यक्ति ही प्रभु प्राप्ति का भेद बता सकता है वही सच्चा गुरु है। हालांकि यह बात मीरा के पद से भी पता चलता है कि उनके गुरु रविदास थे। उन्होंने धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध जाकर शूद्र गुरु रविदास की भक्ति की और  साधु-संतो की संगत में रहीं|

मीरा की मृत्यु को लेकर कई तरह की बाते बताई जाती है। जिनमें कहा जाता है कि लूनवा के भूरदान ने मीरा की मौत 1546 में बताई, जबकि रानीमंगा के भाट ने मीरा की मौत 1548 में बताया तो वहीं डा० शेखावत अपने लेख और खोज के अधार पर मीरा की मौत 1547 में बताते हैं|

आपको बता दें कि मीरा अगल-अलग पदों और गीतों की रचना की, जिसे बच्चों को स्कूल में पढ़ाया भी जाता है। उन्होंने अन्य संतों के तरह अपनी रचनाओं के लिए हिन्दी, गुजरती, ब्रज, अवधी, भोजपुरी, अरबी, फारसी, मारवाड़ी, संस्कृत, मैथली और पंजाबी भाषा का भी इस्तेमाल किया।

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