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भगवान शिव की प्रथम ज्योतिर्लिंग, महाभारत, श्रीमद्भागवत और स्कंदपुराण में हैं वर्णित

नोएडा : द्वादश ज्योतिर्लिंगो में सोमनाथ सर्वप्रथम स्थान पर आता है । हम आपको बताते है , सोमनाथ मंदिर के बारे में। सोमनाथ मंदिर एक प्रसिद्ध प्रचीनतम मंदिर है। इसकी मान्यता द्वादश ज्योतिर्लिंगो में प्रथम स्थान पर है। हम आपको बताते है ज्योतिर्लिंग कहते किसको है ? जहां भगवान भोलेनाथ स्वयं प्रकट हुए थें, उन स्थानो को ज्योतिर्लिंग कहते हैं। यह ज्योतिर्लिंग गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में स्थापित है । पहले इस क्षेत्र को प्रभास नाम से जाना जाता था । पुराणों के अनुसार दक्ष प्रजापति की 27 कन्यायें थी । इन कन्याओ का विवाह चंद्रदेव के साथ हुआ था । लेकिन इन 27 पत्नीयो में चंद्रमा का समस्त प्रेम केवल रोहिणी के प्रति ही था । चंद्रमा के इस भेदभाव से दक्ष की अन्य कन्यायें अप्रसन्न रहा करती थी । समस्त कन्यायें अपने साथ हुए भेदभाव को दक्ष को बताती है ।

जानकारी मिलने के बाद प्रजापति दक्ष चंद्रमा को अनेक प्रकार से समझाते हैं, लेकिन रोहिणी के प्रेम से वो इतने वशीभूत हो गये थे कि दक्ष के समझाने के बाद भी उनपर कोई प्रभाव नही पड़ा । जिसके कारण दक्ष ने क्रोधित होकर चंद्रमा को क्षयग्रस्त हो जाने का श्राप दे दिया । इस श्राप के कारण चंद्रदेव क्षयग्रस्त हो गये। उनके क्षयग्रस्त होते ही पृथ्वी पर सुधा-शीतलता की बारिस होनी बंद हो गई। चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गयी। इन सबके कारण चंद्रमा भी बहुत दुखी थे। चंद्र ने समस्त देवी-देवताओ से प्रर्थना किया। जिसके कारण इंद्र देवता तथा ऋषि विशिष्ठ उनके उद्धार के लिए पितामह ब्रह्मा जी के पास गये और चंद्रमा की सारी कहानी बताई, सारी बाते सुनकर ब्रह्माजी ने उनको सुझाव दिया कि “चंद्रमा  अपने श्राप मुक्ति के लिए अन्य देवों के साथ पवित्र प्रभासक्षेत्र में जाकर मृत्युंजय भगवान शिव की आराधना करें। उनकी कृपा से अवश्य इनका श्राप नष्ट हो जायेगा और ये रोग मुक्त हो जायेंगे ।

ब्रह्मा जी के अनुसार चंद्रदेव ने मृत्युंजय भगवान की आराधना का सारा कार्य पूरा किया। उन्होने घोर तपस्या करते हुए दस करोड़ बार मृत्युंजय मंत्र का जाप किया। इस घोर तपस्या के कारण भगवान मृत्युंजय ने प्रसन्न होकर चंद्रमा को अमर होने का वरदान दे दिया और भगवान ने कहा “ चंद्रदेव तुम शोक न करो, मेरे वरण से तुम्हारे श्राप की मुक्ति तो होगी ही साथ ही साथ दक्ष के वचनो की रक्षा भी हो जायेगी। शाप से मुक्त होकर इंद्रदेव ने अन्य देवताओ के साथ मिलकर मृत्युंजय भगवान से प्रर्थना की ,कि आप माता पार्वती के साथ प्राणो की रक्षा के लिए सदा के लिए यहां निवास करें। भगवान शिव देवतो के अनुरोध को स्वीकार करते हुए माता पार्वती जी के साथ ज्योतिर्लिंग के रुप में तभी से यहां रहने लगे ।

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की महिमा महाभारत, श्रीमद्भागवत और स्कंदपुराण में विस्तार से वर्णित है। चंद्रमा का एक नाम सोम भी है, जिस कारण इनका नाम सोमनाथ पड़ा।।

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